कविता

जितिया और माँ

वाकई बड़ी विचित्र होती है माँ
कितनी भी तबीयत खराब रहे,
भूलती नहीं जितिया का व्रत करना,
मड़ुवा नोनी सतपुतिया झिंगी ओठगन,
रहकर निर्जला, ब्रत करे पूरन
फिर जाकर तुम करती पारण।

अब बस भी करो माँ
बहुत हो चुका अर्पण समर्पण।
बहुत फर्ज निभाया तुमने,
अब कर्तव्य है हमारा है
तिनका तिनका जोड़ तुमने
इस घर को सँवारा है।

कोई व्रत ऐसा भी हो
जब बच्चे निर्जला रहकर,
माँ पिता कि आयु बढ़ाये।

कोई एक दिन ही क्यों हो
हम संतानों का है कर्तव्य
आहत उनको ना पहुंचाएं
उनका मन कभी ना दुखाए।

हमारी उम्र भी लग जाए तुम्हें।
अब बस माँ, निर्जल पूजन।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com