ग़ज़ल
अपनों की चालबाज़ी से हारा हुआ इक शख्स
मैं हूं मियां हालात का मारा हुआ इक शख्स
निकला है कार ले के नशे में कोई रईस
मरेगा अब फुटपाथ पे सोया हुआ इक शख्स
इस मील के पत्थर को रहने दो, न उखाड़ो
शायद कभी आए यहां भटका हुआ इक शख्स
क्या सारी रौनकों की वजह सिर्फ वही था
महफिल वीरान कर गया जाता हुआ इक शख्स
यूं लगा कि ये कहीं देखा हुआ सा है
शीशे में जब दिखा मुझे टूटा हुआ इक शख्स
— भरत मल्होत्रा
