कविता

आदमी के कर्म ही लगे हैं उसको खाने

हाँ जी मैं हिमाचल हूँ
हमेशा रहता था ठंडा और शांत
कुछ लोग कर रहे मेरे सीने में छेद
कर दिया मुझको बहुत अशांत

नालों को सिकुड़ने पर कर दिया मजबूर
कुछ तो इसका असर दिखेगा जरूर
नाले तो अपना रास्ता फिर से बनाएंगे
रोक कर जिनको तू कर रहा था गरूर

देवी देवताओं का अब हो रहा तिरस्कार
धार्मिक आस्थाओं से कर रहे खिलवाड़
इतनी सजा मिल रही फिर भी नहीं डर रहे
इनके प्रकोप से डरो वरना यह सब कुछ देंगे उजाड़

चोटियों पर रहते हैं देवी देवता
पैदल चलते थे सब जब होती थी उनमें आस्था
आजकल कार से जाते है मौज मस्ती में गंदगी हैं फैलाते
आस्था से नहीं उन का दूर का भी वास्ता

आते हैं यहां सब घूमने कहते हैं मुझे देवोँ का घर
कचरा फैला कर चल देते हैं नहीं रहा है किसी का डर
जानबूझकर कर रहे नुकसान खुद का ही
क्या करोगे जब न धरा रहेगी न रहेगा ज़र

अब तो पहाड़ भी लोगों को लगे हैं डराने
इंद्रदेव भी बरसने पर जोर लगे हैं लगाने
आदमी की धन पिपासा लगातार बढ़ती जा रही
आदमी के कर्म ही लगे हैं अब उसको खाने

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र