ग़ज़ल
रहे जो ज़िंदगी घुटती, बदलना सीख पाएँगे।
सदा ही आफ़तों में हम, बहलना सीख पाएँगे।।
चले आँधी-अँधड़ रुकना, नहीं वाज़िब हमारा है।
चलो टकरा सकें तब हम, ठहरना सीख पाएँगे।।
दिखेंगे आज मंजर जो, चलेंगे हम उन्हीं पर ही।
लगे ठोकर न कैसे, तड़पना सीख पाएँगे।।
घिरे रहते सदा हम तो, मुसीबत जब चली आती।
निकलते ही ग़मों से हम, सरसना सीख पाएँगे।।
करो खुश प्यार से सबको, बड़ा अच्छा सलीका है।
दिलों में तब सभी के हम, उतरना सीख पाएँगे।।
लगे ठोकर गिरें बच्चे, उठें हर बार गिरते हैं।
इसी अभ्यास में वे खुद, सरकना सीख पाएँगे।।
सदा मानो कहा देखो, मुसीबत टल सकेगी तब।
बड़ों की बात सुनकर ही, समझना सीख पाएँगे।।
पड़े हर राह पर पत्थर, वही हमको बताएँगे।
( परख कर ठोकरों को फिर, सँभलना सीख पाएँगे।। )
अँधेरों में चलो अब तो, यही तो अब परीक्षा है।
तमस से जूझकर ही सब, चमकना सीख पाएँगे।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
