कविता

पितृ ऋण

मत भूलो पितृ का साया,
ये जीवन का सच्चा सहारा।
घर-आँगन में सुख भर जाते,
अपने तन-मन सब लुटाते।
कठिन तपस्या, मौन त्याग,
हर संकट में खड़े निरंतर।
संतानों की खुशहाली खातिर,
ढोते बोझ सहज निरंतर।
चट्टान-से अडिग वो रहते,
तूफ़ानों से लड़ते रहते।
उनके आँचल में पलकर ही,
खुशियों के फूल हैं महकते।
पथरीली राहों पर चलकर,
सपनों का आकाश सजाते।
पसीने की हर बूंद से वो,
जीवन को अमृत कर जाते।
खुदा का दूजा रूप वही हैं,
जीवन-पथ के दीप वही हैं।
पितृ-पक्ष का मान करे हम,
ये ही परिवार का अभिमान।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com