सांझा पर्व :आँगन में अचानक त्योहार का उल्लास उतर आता है
सांझा पर्व भारतीय लोकजीवन और संस्कृति का ऐसा उत्सव है जो केवल पूजा या अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि उसमें समाज, संस्कार और सामूहिकता के असली स्वर गूँजते हैं। यह पर्व भारतीय ग्रामीण अंचलों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है और विशेषकर बालिकाओं की भागीदारी इसे जीवंत और भावपूर्ण बना देती है। इसका स्वरूप अत्यंत सरल होते हुए भी गहरे प्रतीकात्मक अर्थ समेटे है। जैसे ही भाद्रपद माह की संध्या आती है और सूरज आकाश में डूब जाता है, बच्चियाँ अपने घर-आँगन की मिट्टी को लीपकर वहाँ गोबर या मिट्टी से संध्या देवी का प्रतीक “सांझा” रचती हैं, उसके चारों ओर फूल-पत्तियाँ सजाती हैं, दीपक जलाती हैं। इस छोटे-से आँगन में अचानक त्योहार का उल्लास उतर आता है। बच्चियाँ एक समूह बनाकर उसके चारों ओर बैठ जाती हैं और पारंपरिक लोकगीत गाने लगती हैं। यही गीत सांझा पर्व की आत्मा हैं, इन गीतों में कहीं भोलेपन की मासूम पुकार है, कहीं संध्या देवता को अपने घर लौटने का आग्रह है, तो कहीं स्त्री-शक्ति और श्रृंगार के सांकेतिक बिंब हैं। सबसे प्रसिद्ध गीत है—“सांझा तू अपने घर जा, थारी बाई मारेगी, तू अपने घर जा।” संध्या के समय की वह पवित्रता इन मासूम आवाज़ों में झलकती है और गाँव के मुकाम तक गूंज उठती है। दूसरे गीतों में सांझा की सवारी, रूप-श्रृंगार और ग्रामीण सौंदर्य का चित्रण मिलता है, जैसे—“छोटी-सी गाड़ी रुलकती जाय, जिमें बैठी सांझा बाई, घाघरो घमकाता जाय, चूडलो चमकाता जाय, चूंदड़ी चलकाता जाय, बाईजी की नथनी झोला खाय, देखो ब पियर जाये।” इस गीत में जहाँ सांझा देवी की शोभायात्रा का रूप उभरता है, वहीं बालिकाओं की कल्पना शक्ति भी प्रकट होती है। एक अन्य गीत श्रृंगारिक है जिसमें बालिकाएँ सांझा से श्रृंगार का आग्रह करती हैं—“काजल टीकी लो भई, काजल टीकी लो, काजल टीकी लय ने म्हारी सांझा बाई ने दो।” उदाहरणस्वरूप, ग्रामीण जीवन और पारिवारिक बंधन का चित्रण भी गीतों में मिलता है“म्हारा अंगना में मेंदी को झाड़, दो-दो पत्ती चुनती थी, गाय को खिलाती थी, गाय ने दिया दूध, दूध की बनाई खीर, खीर खिलाई संजा को, संजा ने दिया भाई, भाई की हुई सगाई, सगाई से आई भाभी, भाभी को हुई लड़की, लड़की ने मांडी संजा।” यह गीत दर्शाता है कि कैसे साधारण घरेलू प्रसंग भी लोकगीतों में जीवन का हिस्सा बनकर परंपरा को टिकाए रखते हैं। इसी तरह हरियाली और जीवन चक्र की प्रतीकात्मकता से जुड़ा गीत गाया जाता है,“सांझा तो मांगें हरयो हरयो गोबर, कां से लउ बई हरियो हरियो गोबर, सांझा का वीरा जी माली घरे जाये, के ले बई सांझा हरयो हरयो गोबर।” इन गीतों में वृक्ष, पशु, परिजन, स्त्रियों का श्रृंगार, बच्चों की कल्पनाएँ सब मिलकर सांस्कृतिक एकता का विहंगम रूप प्रस्तुत करते हैं। सांझा पर्व का महत्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि सामाजिक संदर्भों में भी गहरा है। जब बच्चियाँ गीत गाती हैं, तो बड़ी-बूढ़ी स्त्रियाँ उन्हें सिखाती हैं, आशिष देती हैं और इस परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। छोटे गाँवों में यह अकेलापन मिटाकर समुदाय को जोड़ने का अवसर भी बन जाता है। यह पर्व हमें यह अनुभव कराता है कि भारतीय समाज में छोटी-सी परंपरा भी जीवन को कितनी गहराई और आत्मीयता से सींचती है। सांझा केवल संध्या की देवता की आराधना ही नहीं है, बल्कि लोकसंस्कृति की वह कड़ी है जो हमें हमारी जड़ों से बाँधती है। भाद्रपद माह, जिसमें बड़े पर्व जैसे जन्माष्टमी और गणेश चतुर्थी आते हैं, उसमें सांझा पर्व का उल्लास यह बताता है कि हमारे धार्मिक और लोक जीवन में कोई विभाजन नहीं है; वे दोनों एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। संध्या के समय गूँजते ये मासूम गीत, दीपक की मृदु लौ, मिट्टी की सुवास और सामूहिक पूजा का दृश्य यह सिखाता है कि संस्कृति केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि जीवन के सहज और सामूहिक अनुभवों में बसती है। सांझा पर्व इसीलिए भारतीय संस्कृति का जीवंत आयाम है,जहाँ संध्या की पवित्रता, बाल्यकाल की मासूमियत, स्त्री-शक्ति की प्रतीकात्मकता और सामूहिक जीवन की ऊर्जा एक साथ गूँजती है और हमें यह स्मरण कराती है कि लोकधरोहर ही वह धागा है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखता है।
— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह
