जो कभी न डूबे
मैं जिसे हृदय में धड़काता हूं
वो कविता तुम्हें सुनाता हूं
हंगामा काटना मेरा मकसद नहीं
बस सच को सच तक पहुंचाना चाहता हूं
मैं जहां अपना दर्द भूल जाता हूं
वो हालात तुम्हें दिखाना चाहता हूं
गरीब की क्या पीड़ा होती है
ए संसद ! तुझे बताना चाहता हूं
मैं जिसे ओढता-बिछाता हूं
और क्षण-क्षण महसूस करता हूं
दुःखद मंजर राष्ट्र अपने का
मैं झोपड़ी को महल से मिलाना चाहता हूं
मैं देव बनना चाहता हूं
देवों से काम करना चाहता हूं
अंधेरों से लड़कर प्रकाश आएगा
जो कभी न डूबे ऐसा सूरज उगाना चाहता हूं ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
