कहानी

कहानी – सोने पर सुहागा

दिव्या एक प्यारी सी बच्ची, मैटरनिटी लीव के बाद से ही शीला आया ने ही उसकी सारी जिम्मेदारी उठाई । हालांकि उसके लिए उसे मोटी रकम जरूर मिलता। करती भी क्या आखिर मां रितिका और शैलेश जी दोनों जाने- माने वकील जो थे । प्रातः दस बजे जाते तो दोपहर चार बजे से पहले लौटने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता! तब तक दिव्या की सारी जिम्मेदारी बेचारी शिला के नाम।
शीला हर दिन अपने साथ अपनी एक साल की बच्ची रिया को भी साथ लाती । दोनो का पोटी से लेकर दूध पिलाने तक की सारी जिम्मेदारी शिला अकेले ही बड़े अपनापन के साथ करती । कभी-कभी तो शिला दिव्या को भी अपने सतन का दूध पिलाती, जिससे दिव्या को कभी मां की कमी महसूस न होती। खेलने के लिए रिया , तो भोजन के लिए शीला हमेशा तैयार रहती । भला एक बच्चे को और क्या चाहिए?
उधर रितिका और शैलेश जी पूरे दिन कोर्ट के कामों में व्यस्त रहते ।थके – हारे घर आकर दोनों दिव्या के संग कुछ वक्त जरूर बिताते । फिर प्रातः वही दिनचर्या सुबह ,शाम ,रात फिर वही सुबह का चक्र चलता रहता। वक्त बितता ही गया। दिव्या भी बड़ी होती गई। धीरे-धीरे तोतलाता स्वर अब मम्मी पापा भी बोलनी लगी । यहां तक कि शीला सारे कामों से निवृत होकर दोनों को खिलौनों से ही कुछ ना कुछ जरूर सिखाती।

शुरू से ही दिव्या हर चीज में फौरन अपने दिमाग का इस्तेमाल करती ,समझने की कोशिश करती। संध्या होते ही रितिका के आने पर दिव्या बड़े प्यार से पूरे दिन का ब्योरा देती। जिससे उसका बचपना समझ रितिका और शैलेश जी बड़े खुश होते। लेकिन दिव्या की भाषा -शैली शुरू से ही रितिका को खटकता। वह समझाने की कोशिश भी करती लेकिन शिला का पूरा दिन रितिका की एक घंटे पर भारी पड़ता फिर वही सब कुछ ढाल का ढाल पात का पात ही रह जाता ।
दिव्या का किताबों से खेलने का वक्त होता जा रहा था । माता-पिता ने उसे अच्छे विद्यालय में दाखिला भी करा दिया। पहले दिन के बाद विद्यालय लाने , ले जाने की सारी जिम्मेदारी शीला ने हीं उठाई। वहीं दिव्या अपना विद्यालय में दाखिला की बात सुन रिया का भी वही भर्ती की जिद कर बैठी । यह रितिका और शैलेश जी को बड़ा ही अजीब लगा। उन्होंने उसे समझाने की बड़ी कोशिश भी की, लेकिन दिव्या का ज़िद पिता को बाध्य कर दिया, और उसका भी दाखिला उसी विद्यालय करा दिया । लेकिन शीला के लिए यह आकाश के तारे तोड़ने जैसा था। अब वह अन्य घरों में भी काम करती और बड़ी कठिनाई से महीने का वेतन इकट्ठा करती। रिया और दिव्या दोनों एक साथ विद्यालय जाते ।
रितिका पूरे दिन कामकाज के बाद भी दिव्या को पढ़ाने- लिखाने के लिए एक घंटा जरूर बैठती। रितिका का एक ही घंटा पढ़ाना दिव्या की जिन्दगी के लिए सोने पर सुहागा था। लेकिन हां, पढ़ाई के दौरान भी दिव्या की भाषा- शैली देख वह बात- बात पर फटकार लगाती , वह अक्सर खड़ी बोली बोलने को भी कहती, लेकिन उसके कानों पर जूं तक न रेंगता।
आसपास के लोग तो व्यंग भरे शब्दों में कह भी देते, माता-पिता दोनों वकील और बेटी की ऐसी भाषा!
मां जहां अपनी जरूरत के लोगों को छोड़ किसी और से बातें तक नहीं करती , वही बेटी किसी को भी छोटा ना मानती। यहां तक की दिव्या , रिया को अपनी सगी बहन से भी कहीं अधिक प्यार करती । कुछ तो मां बेटी की तुलना भी करते। यहां तक की कुछ शिक्षक भी दिव्या की भाषा शैली को देख आश्चर्य से दंग रह जाते । यह सब देख मां को चिंता भी होती, लेकिन समय के व्यस्तता ने रितिका को बिल्कुल जकड़ रखा था। यद्यपि पढ़ने -लिखने में निपुण देख शिक्षकों की वह अक्सर ही प्यारी बनी रही। देखते-देखते वह जीवन का पहला पड़ाव दसवीं कक्षा में 90% नंबर लाकर उत्तीर्ण हुई । जिससे जहां माता-पिता का सिर गर्व से ऊपर उठ गया , वही शीला देवी भी बहुत ही खुश हुई । रीतिका के न चाहने के बाद भी दिव्या मिठाई का पोटला लिए शीला के चरण स्पर्श की। यह देख जहां पिता को अपनी बेटी पर गर्व महसूस हो रहा था, वही रितिका परिस्थितियों को भापते हुए आक्रोश से डूबी रही । किम- कर्तव्य विमुढू अवस्था में देख शैलेश ने कह भी दिया। रितिका संभालो अपने आप को, तुम्हें तो दिव्या पर गर्व होना चाहिए कि दिव्या छोटे -बड़े जाति, धर्म का कोई भेदभाव नहीं करती । वरन् आज कल के बच्चे तो थोड़ी सी पढ़ाई क्या कर लिये , नीचे वालों से बात करने में भी अपनी बेइज्जती महसूस करते हैं। यहां तक कि उन्हें अपने माता-पिता से बात तक करने की भी फुर्सत नहीं होती , और भाषा शैली तो वक्त के साथ सुधर ही जाएगा । खैर, छोड़िए ये सब और खुश हो जाइए ! दुखी होकर क्या फायदा ! वक्त हमारे हाथों से जा चुका है । यह सब हम दोनों की व्यवस्ता का ही नतीजा है। शैलेश ने समझाते हुए कहा।
चिंता भरा आक्रोश देख ,
सच को स्वीकार कीजिए, बचपन में यदि हमने दिव्या को अपना सारा वक्त दिया होता तो शायद आज वो आपके जैसी ही होती! ” “मतलब , आपको दिव्या पसंद है, मैं नहीं?” आक्रोश भरे निगाहों से रितिका ने कहा।
मैंने ऐसा नहीं कहा रितिका, ” मेरे लिए तुम्हारी जगह तुम हो, और बेटी की जगह बेटी दिव्या है। मुझे दोनों पसंद है। दोनों ही मेरी जान का टुकड़ा है, लेकिन मुझे मेरी बेटी पर गर्व है।
शैलेश जी बांहे फैलाए ही थे, कि दोनों आकर लिपट पड़े…. उनके मुख से एक ही स्वर निकला–” प्राउड ऑफ़ माय सन “

— डोली शाह

*डोली शाह

1. नाम - श्रीमती डोली शाह 2. जन्मतिथि- 02 नवंबर 1982 संप्रति निवास स्थान -हैलाकंदी (असम के दक्षिणी छोर पर स्थित) वर्तमान में काव्य तथा लघु कथाएं लेखन में सक्रिय हू । 9. संपर्क सूत्र - निकट पी एच ई पोस्ट -सुल्तानी छोरा जिला -हैलाकंदी असम -788162 मोबाइल- 9395726158 10. ईमेल - shahdolly777@gmail.com