हास्य व्यंग्य

गणित का गलत सवाल

स्कूली दिनों में मेरा और गणित का वही सम्बन्ध था जो आमतौर पर किशोरावस्था में टपोरीछिछोरों का लड़कियों से, कितना भी कोशिश कर लो पल्ले न पड़ती। गणित की कक्षा आग का कमरा और गणित के मास्टर जी मुझे दुःशाशन लगते, न जाने कब कौन सा सवाल पूछ मुर्गा बना सरे क्लास चीर हरण कर दे। स्कुल गावँ से बाहर था नहीं तो भाई, दोस्त टाइप कोई कृष्ण भी मिल ही जाता जो इस दुःशाशन को सबक सिखाता।
गणित के सवाल जब पूछे जाते तो महसूस होता की कोई लड़की दिल से गाली निकाल रही है और मै बेईज्जत हो रहा हूँ। किसी तरह ट्यूटर ने हम दोनों मध्यस्थता कर मेल कराया और पास हो गया, फस्ट क्लास।
उस जमाने में एक सवाल पूछा जाता था, “मानो एक ट्रेन एक स्टेशन से और दूसरी ट्रेन दूसरे स्टेशन से विपरीत दिशा से अमुक स्पीड से आ रहीं है तो एक दूसरे को कितनी देर में पार कर लेंगी”
ये सवाल बेहद परेशांन करने वाला एवं असामाजिक था। कोई व्यावहारिक बात न थी। निश्चित ही सवाल को ईजाद करने वाला शक्श सामाजिक आदमी नहीं था, उसे सरकार और उसकी प्रणाली पता नहीं रही होगी, रेल व्यवस्था के बारे में तो बिलकुल नहीं, अन्यथा इस तरह के बेहूदे सवाल नहीं बनाता। यहाँ खुद रेलवे मंत्रालय और उनके अधिकारियों तक को नहीं पता होता की ट्रेन कब चलेगी, कब कहाँ पहुचेगी, किस स्पीड से कब चलेगी तो हम जैसे छोटे बच्चे क्या बता पाते भला।
पहले ट्रेन स्टेशन से छूट जाए तो वही भला, ढेर सारी बातें होतीं है इसमें, ट्रेन भगाने के समय गार्ड खैनी मल रहा होता, स्टेशन मास्टर चाय पि रहे होते है, ड्राईवर मौके का फायदा उठा झाड़ा फिर रहा होता है। गार्ड साहब अपने डब्बे में बिठाने को एक्स्ट्रा सवारी ढूंढ रहे होते हैं। सारे लोग सही समय पे एक साथ ट्रेन निकालने को तैयार हों तो ये एक मात्र सयोंग ही होता है। इन सब से रेल यात्री परिचित होता है, यूँ कह ले उसकी आदत बन चुकी होती है, अच्छी बात है की अधिकांश भारतीय यूरोप इत्यादि नहीं जा पाता है, और रेलवे के आलोचक कम होते जाते हैं। निश्चित ही मास्टर साब भी इनसब बातों से अनजान रहे होंगे।
अब ट्रेन छूट भी जाए तो अपने नियत स्पीड से चलेगी ये ड्राईवर के नींद और मूड पे डिपेंड करता है, और ट्रेन बिहार उपी आदि राज्यों में हो तो आम जन भी अपना चेनपुलिंग इत्यादि सामाजिक कार्यकलापों से योगदान दे ट्रेन को आपे से बाहर नहीं जाने देते, उसे औकात में रखते हैं। चलो अब भी चल ले, लेकिन चोर पटरी का नट बोल्ट खोल लिया हो तो? कोई आंदोलन हो जाए और प्रतिभाशाली क्रांतिकारीयों द्वारा पटरियां उखाड़ दी जाएँ तो? मास्टर जी निनांत अनभिज्ञ ही थे सामाजिक प्राणियों से।
इन सब से भी बचते बचाते निकल ले तो कौन जाने कोई धर्मात्मा जनो का समूह कुछ दूर पे ही ट्रेन को घेर ले, मिटटी का तेल डाल आग लगा दें, पत्थरों की बौछार कर दे, दरवाजे बंद कर दें, और ट्रेन से चिता बन जाएँ, ट्रेन और उसके यात्री धूं धूं कर के जल जाएँ, गोधरा की तरह, और वो ट्रेन कभी कहीं न पहुचे।
मास्टर साहब का सवाल गलत था, बिलकुल गलत। भारत में ये सवाल ही गलत है।

— कमल कुमार सिंह