गज़ल
हर जड़ से उखाड़ गया हूं मैं
ये न पूछ कहां-कहां से निकाला गया हूं मैं !
लोगो ने कहा तेरा नसीब ही खराब है
इस बात की आड में हर जगह वंचित किया गया हूं मैं !
गलती चाहे किसी की भी रही हो
हर बात का जिम्मेवार ठहराया गया हूं मैं !
हौसला तो चट्टान की तरह कर लिया लेकिन
लोगो के आघात से बार-बार टुकड़े- टुकड़े किया गया हूं मैं
खानाबदोश-सी है दर -बदर जिंदगी अपनी
अपनी हर पहचान से महरूम किया गया हूं मैं !
अब न पूछ इस दिल का हाल मुझसे
रोज-रोज ठगा हुआ महसूस किया गया हूं मैं !
— विभा कुमारी “नीरजा”
