कविता
कागज के पन्नों पर
रह-रहकर
बेलगाम
होते हुये मन पर
उठा लेती हूँ चाबुक
कि जितना कहूँ
उतना ही
लिखना
जितना खोलूँ
उतना ही खुलना
लिखना
नींद आयी थी
ख़्वाबों का ज़िक्र
मत करना
लिखना..याद आयी थी
कोई नाम मत लेना
लिखना
धूप-छाया-बरसात की
नमी की रात
मत लिखना
कि कागज के पन्नों पर
उतरा हुआ
बेलगाम मन
बेवजह उमड़ता-घुमड़ता
अंगड़ाई लेता
बिखरेगा
और..
कभी बताकर कभी छुपाकर
जहाँ-तहाँ
चल देगा
— मृदुला प्रधान
