धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

विजयदशमी का शाश्वत संदेश यही है कि सत्य अनादि और अनंत है, 

विजयदशमी भारतीय संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, यह दिन भारतीय जीवन-दर्शन की मूल आत्मा अर्थात् सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था और इस प्रकार अधर्म, अन्याय तथा अहंकार के प्रतीक रावण का अंत हुआ। इसी से यह पर्व संदेश देता है कि चाहे असत्य और अधर्म कितने ही प्रबल क्यों न हों, अंततः विजय धर्म, सत्य और मर्यादा की ही होती है। भारतीय परंपरा में इस तिथि का संबंध महिषासुर वध से भी है, जब माँ दुर्गा ने लगातार नौ दिन तक युद्ध कर दशमी के दिन उसका अंत किया और देवताओं को पुनः शक्ति व सम्मान दिलाया। दक्षिण भारत और महाराष्ट्र की परंपरा में यह दिन अर्जुन द्वारा शमी वृक्ष से अपने अस्त्र निकालने और विजय अभियान आरंभ करने से जुड़ा है, इसलिए इसे आयुध पूजन का पर्व भी कहा जाता है।इस दिन का सांस्कृतिक स्वरूप अत्यंत व्यापक और बहुरंगी है। उत्तर भारत में जगह-जगह रामलीला का मंचन होता है और रावण, मेघनाद तथा कुंभकर्ण के विशालकाय पुतलों का दहन कर बुराई के अंत का प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया जाता है, जिसे देखने हजारों लोग एकत्रित होते हैं और यह सामूहिक चेतना का बड़ा उत्सव बन जाता है। बंगाल, ओडिशा और असम जैसे प्रांतों में इसी समय दुर्गा पूजा का समापन होता है और माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन गीत, नृत्य और भावनापूर्ण उत्सव के बीच किया जाता है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इस दिन हथियारों, औज़ारों, पुस्तकों और कार्य-साधनों की पूजा की जाती है क्योंकि भारतीय संस्कृति यह मानती है कि साधन के प्रति आदर और श्रम के प्रति सम्मान ही प्रगति और विजय के मूल तत्व हैं।विजयदशमी केवल धार्मिक या पौराणिक स्मृति भर नहीं है, इसका सामाजिक और नैतिक संदेश भी गहरा है। हर वर्ष जब रावण का पुतला जलता है तो यह हमें भीतर झाँककर यह प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है कि क्या हमने अपने भीतर बसे रावण, यानी लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार और असत्य को परास्त किया है? यह पर्व हमें आत्म-सुधार और सकारात्मक जीवन दृष्टि का मार्ग बताता है। माँ दुर्गा की विजय यह स्मरण कराती है कि शक्ति का सही उपयोग तभी है जब वह धर्म और न्याय की रक्षा में लगाया जाए, अन्यथा वही शक्ति विनाश का कारण बन सकती है। अर्जुन का प्रसंग यह सिखाता है कि उचित समय पर अस्त्र-सज्जा और पराक्रम का प्रदर्शन भी सफलता का आधार है।भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल आनंद और उत्सव का अवसर नहीं होते, वे आत्मचिंतन, शिक्षा और समाज में एकता का माध्यम भी होते हैं। विजयदशमी का सामूहिक स्वरूप लोगों को एकता  के सूत्र में बाँधता है, सामूहिक पर्व समाज में मेल-जोल और एकता को मजबूत करते हैं। यह पर्व बच्चों को राम के आदर्शों, दुर्गा की शक्ति, अर्जुन के पराक्रम और सत्य की महत्ता से परिचित कराता है। साथ ही, यह पीढ़ियों को यह स्मरण दिलाता है कि जीवन में चाहे कितने भी संघर्ष हों, यदि हम धर्म, मर्यादा और सत्य के पथ पर चलते हैं तो निश्चित ही विजय हमारी होगी।विजयदशमी का शाश्वत संदेश यही है कि सत्य अनादि और अनंत है, वही अंतिम रूप से विजेता होता है। यह पर्व हमें न केवल धर्मग्रंथों की याद दिलाता है, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के व्यवहार, नैतिकता और निर्णयों पर भी रोशनी डालता है। इस प्रकार विजयदशमी भारतीय संस्कृति की गहराई और उसकी शिक्षाओं का जीवंत उदाहरण है, जो युगों से हमें अच्छाई का मार्ग दिखाता आ रहा है और आने वाली पीढ़ियों को भी यही अमर संदेश देता रहेगा।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह  

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।