ग़ज़ल
वो जो कहदे सब करना,
दुनिया जैसा ढब करना।
दिल कुछ करना चाहेगा,
चाहेंगे कुछ लब करना।
सोचो करने से पहले,
क्या करना है,कब करना।
है इंसा के हाथों में,
जिसको चाहे रब करना।
हिन्दुस्तानी हो, छोड़ो,
भाषा ओ मज़हब करना।
ठाना है जय ने जो भी,
करना है मतलब करना।
— जयकृष्ण चांडक ‘जय’
