कविता

इमोशनल साला

बात बात और समय कुसमय
ये क्यों हो जाता है इमोशनल,
कभी भी नहीं हुआ प्रोफेशनल,
पता नहीं इमोशनल होके ये क्या पाता है,
अपने आप को प्रोफेशनल नहीं बताता है,
क्या,कब और कैसे रहना है
दुनियावालों ने गंभीरता से बताया है,
इनके साथ वालों ने भी
उड़ती चिड़िया पर दांव लगाया है,
तभी तो उनके इमोशनल होने पर
जगह जगह दंगे हो जाते हैं,
विरोध करने वाले अच्छे खासे
स्वस्थ व्यक्ति भी कहां खो जाते है,
हमने सुना था कि पहले
लोग किसी बात पर भरपूर विचार करते थे,
सोच समझ कर अपनी बात धरते थे,
न कोई हल्ला,न कोई विवाद,
मिल जाता था बेहतर प्रतिसाद,
सभी सामाजिक सुचिता अपनाते थे,
सादगी से संवाद कर पाते थे,
मगर अब तो सोच समझ कर
लोगों को भड़काया जाता है,
एक पल में दंगा कराया जाता है,
मैं आज तक समझ नहीं पाया कि
वो साला इमोशनल होता क्यों है,
बहती गंगा में हाथ धोता क्यों है?

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554