चाहत समाज की
मोहब्बत ही मोहब्बत भरी मेरे अंग अंग
क्यों करूं मोहब्बत किसी और को टूट,
सफेदपोश बनकर बैठे हैं कई रहबर
मन से लेकर मेरे तन को भी लूट लूट,
जिस चाहत व समर्पण की थी मुझको आस,
मेरे एक एक लोगों को हो चुका था विश्वास,
सपने जगाकर और सपने बड़े दिखाकर,
पिगें बढ़ाने लगा औरों से रोज छुप छुपाकर,
सबका विश्वास जब पा गया वो भरपूर,
हम सब से छिटककर गया वो बहुत दूर,
दर्द होता है जब कोई सपने रौंदे ले बूट,
तो क्यों करूं मोहब्बत किसी और को टूट,
गले में ही रह जाती थी आस गला तर करने की,
इजाजत नहीं थी औरों की तरह पांव धरने की,
इंसानों से इंसानियत और मोहब्बत की दरकार,
सबने नफरत ही भर भर परोसा नहीं दिया प्यार,
बदल डाला हर नफरती किताब और नियम,
छोड़ बदले की भावना रखा खुद पर संयम,
किया उसने चमत्कार जिन्हें नहीं मिला दो घूंट,
तो क्यों करूं मोहब्बत किसी और को टूट।
— राजेन्द्र लाहिरी
