राजनीति

योगी की पाती और बदलते यूपी का सपना

कभी उत्तर प्रदेश की पहचान उसके सामर्थ्य से नहीं, उसकी बदहाली से होती थी। अब उसी प्रदेश की पहचान बदलने का दावा है। योगी आदित्यनाथ की पाती इसी बदलाव का खाका सामने रखती है—बीमारू से आर्थिक शक्ति और अवसरों के केंद्र तक पहुंचने का। 25 से 29 सितंबर तक ग्रेटर नोएडा में होने वाला चौथा यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो इस दावे को दुनिया के सामने रखने का बड़ा मंच है। यह महज व्यापारिक प्रदर्शनी नहीं, नौ वर्षों की विकास-यात्रा का प्रदर्शन भी है। एमएसएमई और ओडीओपी जैसी योजनाओं से चार करोड़ से अधिक रोजगार अवसरों का दावा, बढ़ता निर्यात तथा निवेश इस परिवर्तन के आधार के रूप में रखे गए हैं। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है—इन आंकड़ों की चमक जमीन पर कितनी बदली हुई जिंदगी में दिखाई देती है।

जिस प्रदेश का नाम कभी पिछड़ेपन, बेरोजगारी और पलायन से जुड़ा था, वही अब अपनी आर्थिक पहचान बदलने की कोशिश में है। विशाल आबादी, कमजोर औद्योगिक आधार, सीमित अवसर और कानून-व्यवस्था की पुरानी छवि ने लंबे समय तक यूपी को ‘बीमारू’ बनाए रखा। अब सरकार इस तस्वीर को बदलकर ‘उत्सव प्रदेश’ की पहचान गढ़ने का दावा कर रही है। इसकी बुनियाद बड़े आयोजनों से अधिक स्थानीय हुनर को बाजार से जोड़ने में है। ‘एक जनपद एक उत्पाद’ ने काशी की रेशमकारी, मुरादाबाद के पीतल और अलीगढ़ के तालों जैसे पारंपरिक उत्पादों को बाजार दिया। अब ‘एक जनपद एक व्यंजन’ इसी सोच को स्वाद और संस्कृति तक ले जा रहा है। लक्ष्य है—स्थानीय पहचान को बाजार की ताकत और वैश्विक पहचान में बदलना।

यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की अगली कड़ी है। इस बार जापान, वियतनाम, रूस, सिंगापुर, ऑस्ट्रिया और बेलारूस साझेदार देश हैं। करीब 72 देशों से 600 अंतरराष्ट्रीय खरीदार और 2,400 से अधिक प्रदर्शक जुटेंगे। लेकिन सफलता भीड़ या भव्यता से नहीं, कारोबार से तय होगी—विदेशी खरीदार उत्पाद पसंद करने के साथ ऑर्डर दे, दोबारा लौटे और स्थानीय उद्यमी उत्पादन बढ़ाए, तभी यह आयोजन आर्थिक सफलता बनेगा। उत्तर प्रदेश के सामने अब ‘वोकल फॉर लोकल’ को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने की चुनौती है। इसके लिए कारीगर को डिजाइन, पूंजी, तकनीक, गुणवत्ता, पैकेजिंग और निर्यात की समग्र व्यवस्था देनी होगी।

विकास की सबसे बड़ी कसौटी रोजगार है। सरकार पिछले नौ वर्षों में साढ़े नौ लाख सरकारी नियुक्तियों और अगले छह महीनों में एक लाख और नियुक्तियों की बात करती है। एमएसएमई और ओडीओपी से चार करोड़ से अधिक रोजगार अवसरों का दावा भी इसी तस्वीर का हिस्सा है। युवाओं से नौकरी मांगने के बजाय नौकरी देने वाला बनने को कहा जा रहा है। लेकिन उद्यमिता के लिए बैंक ऋण, बाजार, कौशल, तकनीक, बिजली, सरल नियम और कारोबारी भरोसा जरूरी हैं। चार करोड़ अवसरों की असली तस्वीर तभी सामने आएगी, जब पता चले कि कितने स्थायी हैं, कितनों से पर्याप्त आय हो रही है और कितने युवाओं का रोजगार के लिए प्रदेश से बाहर जाना घटा है। यूपी का सपना तभी मजबूत होगा, जब युवा अपना भविष्य इसी प्रदेश में देख सके।

एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य तभी सार्थक है, जब यूपी की संभावनाएं जमीन पर आर्थिक गतिविधि में बदलें। प्रदेश के पास बड़ा बाजार, श्रमशक्ति, कृषि, उद्योग और घरेलू मांग है। एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारे, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी, पर्यटन, कृषि-प्रसंस्करण और एमएसएमई इसके विस्तार के आधार हैं। कानून-व्यवस्था में सुधार और बुनियादी ढांचा निवेश की जमीन तैयार करते हैं। लेकिन निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश अलग हैं। कागज पर दर्ज हजारों करोड़ रुपये तब तक अर्थव्यवस्था नहीं बनते, जब तक कारखाने न लगें, उत्पादन और रोजगार न बढ़े। योगी सरकार के विकास मॉडल की असली परीक्षा घोषणाओं और नतीजों के बीच की दूरी घटाने में है।

विकास की यह तस्वीर राजनीतिक संदर्भ से अलग नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विकास, निवेश, कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की उपलब्धियां स्वाभाविक रूप से राजनीतिक महत्व रखती हैं और सरकार उन्हें व्यापक विकास-वृत्तांत के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लेकिन लोकतंत्र में उपलब्धि का अंतिम पैमाना प्रचार नहीं, नागरिक का अनुभव है। किसान की आय, महंगाई, रोजगार की गुणवत्ता, छोटे कारोबारी की स्थिति और गांव-कस्बों तथा बड़े शहरों के बीच अवसरों का अंतर ही असली सवाल हैं। नोएडा का चमकता मंच तभी पूरे यूपी की तस्वीर बनेगा, जब बलिया, बहराइच, बुंदेलखंड, मुरादाबाद और चित्रकूट का छोटा उद्यमी भी कह सके कि उसके कारोबार के अवसर सचमुच बदले हैं।

उत्तर प्रदेश की ताकत केवल सरकारी योजनाओं में नहीं, उसकी विविध स्थानीय पहचान और सामाजिक-सांस्कृतिक पूंजी में भी है। ब्रज की संस्कृति, अवध का स्वाद, पूर्वांचल का श्रम, बुंदेलखंड की जीवटता और पश्चिमी यूपी की औद्योगिक क्षमता मिलकर एक बड़े आर्थिक प्रदेश की ताकत बनती हैं। इन्हें बाजार, पर्यटन और निर्यात से जोड़ने पर संस्कृति केवल विरासत नहीं रहती, आय का स्रोत बनती है। यही ‘उत्सव प्रदेश’ की सार्थकता है—उत्सव के पीछे उत्पादन, उत्पादन के पीछे बाजार और बाजार के साथ आम आदमी की बढ़ती आय।

सपना बड़ा है, इसलिए उसकी परीक्षा भी बड़ी होगी। ‘बीमारू’ की छवि न एक दिन में बनी थी, न किसी एक आयोजन से मिटेगी; यह लंबी आर्थिक यात्रा है, जिसमें ट्रेड शो एक महत्वपूर्ण पड़ाव हो सकता है, मंजिल नहीं। असली बदलाव तब दिखेगा, जब यूपी के उत्पाद एक्सपो की दीवारों से निकलकर दुनिया के बाजारों तक पहुंचें; कारीगर को बिचौलिया नहीं, सीधा बाजार मिले; युवा को पलायन नहीं, अपने प्रदेश में अवसर दिखे; और निवेश प्रस्ताव कारखानों, उत्पादन और रोजगार में बदलें। तभी ‘उत्सव प्रदेश’ सरकारी शब्द नहीं, उत्तर प्रदेश की नई आर्थिक पहचान बनेगा। जो प्रदेश कभी ‘बीमारू’ कहलाने की विवशता से जूझता था, वह अब अपने भाग्य का निर्माता बनने की राह पर है। सपना घोषित हो चुका है—अब उसकी सच्चाई परिणाम लिखेंगे।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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