नदी और किनारा
कल-कल, छल-छल करती दरिया
पर्दादारी करती, अपना भेद छुपाती बढ़ती जाती
अपना भेद छुपाती, नहीं खोलती राज अपने दिल का
ऊपर-ऊपर हँसती, किनारों पर पड़ी
सब को अंगीकार करती बढ़ती जाती
नहीं निराश करती किसी को
जो भी जो कुछ देता समेटती चली जाती
नहीं भूलती किनारों को चूमना
और क्षण भर को उससे संवादाता करना
नहीं रूकती तब तक, जब तक
समन्दर के बाहों में जाकर लिपट नहीं जाती
— डॉ मंजू लता
