अनंत यादों के पंख
कुछ बातें रहती हैं याद,
अनंत काल तक,
शायद वे घटित ही होती हैं
बस इसलिए,
कि जीवन में रहें
हर पल, हर श्वास,
जीवन पर्यंत।
जैसे कि
स्कूल के उन कोमल दिनों में
कॉपियों में रखे हुए
सोपनर से छिले
पेंसिल के कतरन,
बिलकुल गोलाई में कटे,
सूखे पीपल के पत्ते,
मोरपंख और
गुलाब की मुरझाई पंखुड़ियाँ
जिन्हें आज भी स्पर्श करो
तो वे हो उठती हैं ताज़ी,
मुस्कुराती, जीवंत।
और हाँ, बचपन के वे दिन,
जब बिजली कड़कती थी
तो डर के संग खिलखिलाहट होती थी,
और किसी ने कहा था!!
“गोबर पर गिरे बिजली तो बन जाए सोना!”
क्या भोलेपन भरे थे वो पल,
क्या नासमझी थी वो मिठास भरी!
वही तो हैं वे सारी यादें
पहला ख़त,
छुपाकर पढ़ना,
वो अबोध-सा प्रेम,
चाहे प्राप्य रहा हो या नहीं,
रह जाता है मन की तहों में
अनंत काल तक।
उम्र के हर पड़ाव पर
जब भी ये स्मृतियाँ लौटती हैं,
चेहरे पर
एक नई रौनक बिखेर जाती हैं।
यादों की यही निशानियाँ
रहती हैं हमारे भीतर
अनंत काल तक।
— सविता सिंह मीरा
