किरदार
इस जीवन में सबका किरदार है अपना अपना
किसी को मिलती है मंजिल कोई देखता रहता है सपना
कठपुतली की तरह नचाता है सब को वह
संसार में बहुत अद्भुत है जिसकी हर रचना
कोई मां का कोई पिता का किरदार है निभाता
जीवन का हर रिश्ता ऊपर से बन कर है आता
काम नहीं आता खून का रिश्ता भी कई बार
जुड़ जाता है किसी से फिर भी गहरा नाता
कोई किसी से नहीं मिलता न कोई है मिलता
यह सब तो पैदा होने से पहले ही तय हो जाता
अपनी मर्जी से कोई जी नहीं सकता यहां
जितना लिखा है उससे एक पल भी ज़्यादा नहीं जी पाता
अमीर के घर है पैदा होता है कोई
कोई गरीबी मे ही अपनी उम्र है बिताता
मनपसंद चीजे खा नहीं सकता कोई
कोई हर चीज़ का लुत्फ है उठाता
जीवन की डोर ऊपर वाले ने रखी है अपने हाथ
लिखा है जितना उससे ज़्यादा नहीं मिलता किसी का साथ
कठपुतली की तरह नचाता है खींचता रहता है डोर
कुछ नहीं मिलता उसे जो जीवन से हो जाता हताश
— रवींद्र कुमार शर्मा
