राजनीति

बलूचिस्तान में उग्र होता आंदोलन–

बलूचिस्तान को आजाद कराने का संघर्ष नए दौर में पहुंच गया है और यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में खून- खराबा बढ़ने वाला है। यह एक खतरनाक दौर का आगाज है। युद्ध के नियम हमने नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना ने बदले हैं। हम इन बदले हुए नियमों को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और सेना को उसी की भाषा में जवाब देंगे। “

– जफर बलोच, राजनीतिक कार्यकर्ता

बलूचिस्तान, पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत लंबे समय से

राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों का सामना कर रहा है।

हाल के महीनों में बलूचिस्तान में हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं, विशेष रूप से पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाते हुए। उदाहरण के लिए, जाफर एक्सप्रेस ट्रेन के अपहरण और नोशकी में सेना के काफिले पर हमले जैसी घटनाओं ने संकेत दिया है कि बलूचिस्तान में पाकिस्तानी नियंत्रण कमजोर होता जा रहा है।

अशांत बलूचिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और अरब सागर से घिरा हुआ क्षेत्र है। यहां की राजधानी क्वेटा और प्रमुख भाषा पश्तू व बलूची है।

छितरी आबादी वाले इस प्रदेश में बलूची, पश्तून और अन्य छोटे-छोटे जातीय समूह रहते हैं। बलूच समुदाय की अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान है जिसके लिए वह संघर्षरत है जो पाकिस्तान से टकराव का कारण बनती रही है।

बलूचिस्तान की समस्या की जड़ें 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय बलूचिस्तान ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी,

लेकिन जल्द ही पाकिस्तान में इसका विलय कर लिया गया। तब से, बलूच राष्ट्रवादियों का राजनीतिक स्वायत्तता और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए संघर्ष जारी है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद बलूचिस्तान आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि संसाधनों का दुरुपयोग करते हुए उनका शोषण ही किया जा रहा है।

इसके अलावा, पाकिस्तानी सेना द्वारा मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी स्थिति को और जटिल बना रहे हैं।

बलूचिस्तान में जबरन गायब किए गए पीड़ितों की पुकार बन चुकी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं बलूच यकजेहती समिति की केन्द्रीय संरक्षक डा. महरंग बलूच (वर्ष 2025 के लिए नोबल शांति पुरस्कार हेतु नामित) पाकिस्तानी प्रशासन के निशाने पर है।

शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रही महरंग को पहले जबरन गायब कर दिया गया फिर आतंकवाद का आरोप मढ़ दिया गया। महरंग सहित 150 अन्य नेता क्वेटा की जेल में बंद है।

इन पर आतंकवाद के अलावा हत्या, हत्या का प्रयास, हिंसा-

विद्रोह करना, अव्यवस्था पैदा करना व सम्पत्ति को नुकसान

पहुंचाने जैसे आरोप लगाए गए हैं।

प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी के विरोध में बलूचिस्तान के कई शहर लगातार बंद रहे ।

51 शक्तिपीठों में से एक

बलूचिस्तान में माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ ‘हिंगलाज माता’ का मन्दिर है जहां माता का सिर

गिरा था। यह मंदिर हिंगोल नदी के पास स्थित पहाड़ी पर है।

इस स्थान पर भगवान श्रीराम, परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि, गुरु गोरखनाथ, गुरु नानक देव जी जैसे महान संत

आ चुके हैं।

हिंगलाज माता कई समाजों की कुलदेवी के रूप में विख्यात है । बलूचिस्तान में भगवान बुद्ध की सैंकड़ों मूर्तियां भी पाई गईं है। खास बात यह है कि इस स्थल की देखरेख वहां के स्थानीय बलोच लोग करते हैं।

आदिशक्ति स्थल की पूजा में यह लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। बलोच लोग इसे ‘नानीपीर’ नाम से बुलाते हैं।

बलूचों का पाकिस्तान से लंबा संघर्ष

11 अगस्त, 1947 को बलूचिस्तान अधिकृत रूप से एक

स्वतंत्र देश बन चुका था, फिर 27 मार्च, 1948 को पाकिस्तान ने भौगोलिक महत्वाकांक्षा के चलते बलूचिस्तान पर हमला कर उसको अपने कब्जे में ले लिया।

पाकिस्तान में बलूच राष्ट्रवादियों के संघर्ष के कई लंबे-लंबे दौर चले हैं। पहली लड़ाई तो बंटवारे के बाद 1948 में ही छिड़ गई थी।

उसके बाद 1958-59, 1962-63 और 1973-77 के दौर में संघर्ष तेज रहा। वर्तमान अलगाववादी संघर्ष का हिंसक दौर 2000 के बाद शुरू हुआ।

संघर्षरत संगठन ‘बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी’ जिसे पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन ने प्रतिबंधित घोषित कर

रखा है, मुख्य भूमिका में है।

इसके अलावा भी कई छोटे संगठन लश्कर-ए-बलूचिस्तान और बलूच लिबरेशन यूनाइटेड फ्रंट भी सक्रिय हैं जो पाकिस्तान की बर्बर कार्रवाई के चलते पाकिस्तान सरकार के मुख्य ठिकानों पर हमले करने और अधिक उग्र रूप धारण करने के लिए विवश हैं।

बलूचों का आंदोलन उस वक्त और तेज हो गया, जब पाकिस्तान ने उनकी भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा चीन के

हवाले कर दिया।

चीन यहां पाकिस्तान के साथ मिलकर आर्थिक कॉरिडोर बनाना चाहता है जिसे बलूचों ने सिरे से खारिज कर दिया।

दूसरा इसके निर्माण में केवल चीनी इंजीनियर या मजदूर ही लगाए गए हैं। बलूच लोगों को इससे बाहर रखा गया है। इससे प्राप्त लाभ में 75 फीसदी हिस्सेदारी चीन की है और 25 फीसदी पाकिस्तान की है।

बलूचिस्तान को इसमें से कुछ नहीं मिलता है जबकि कहते जरूर हैं कि 2 फीसदी दिया जाता है।

सचाई ये है

दरअसल, पाक-चीन आर्थिक गलियारे से चीन का सामरिक हित जुड़ा है।

इसके माध्यम से ग्वादर बंदरगाह, रेलवे और हाइवे के माध्यम से तेल और गैस का कम समय में परिवहन होता है। चीन यहां पर सड़कों को चौड़ा कर रहा है और हवाई अड्डा बनाने में जुटा है।

यह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान होते हुए जायेगा।

यह पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान का विकास नहीं, भारत पर दबाव बनाने की रणनीति का एक हिस्सा है जिसे भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार अवैध मानते हुए अपना विरोध दर्ज कराया है।

यह गलियारा बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन के काशगर से जोड़ेगा जहां पर पूर्ण रूप से चीन का नियंत्रण है।

प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा

बलूचिस्तान में प्राकृतिक गैस के भंडार के अलावा यूरेनियम, पेट्रोल, तांबा और ढेर सारी दूसरी धातुएं भी हैं।

यहां के सुई नामक जगह पर मिलने वाली गैस से पूरे पाकिस्तान की आधी से ज्यादा जरूरत पूरी होती है लेकिन इसके बदले स्थानीय बलूची लोगों को न तो रोजगार मिला और न ही रॉयल्टी ।

हालांकि दिखावे के लिए दी जा रही रॉयल्टी भी यह कहकर वापस ले ली जाती है कि गैस निकालने की लागत अधिक है। इससे बलूचिस्तान पर कर्ज बढ़ता जा रहा है।

बलूचिस्तान पर पाकिस्तान अपनी हुकूमत तो चलाना चाहता

है लेकिन बलूची लोगों को राजनीतिक या आर्थिक अधिकार

देने को तैयार नहीं।

फिलहाल बलूचिस्तान में विरोध की आवाज बुलंद हो गई है जिसे दबाना अब पाक के बस की बात नहीं दिख रही है।

फिलहाल 2025 में, जाफर एक्सप्रेस हाईजैक के साथ यह आंदोलन एक ऐसे युग में प्रवेश कर रहा है जिसमें या तो बलूचों का बलूचिस्तान से नामो-निशान मिट जायेगा या फिर बलूचिस्तान, पाकिस्तान से हमेशा-हमेशा के लिए स्वतंत्र हो जायेगा, पर अभी यह ज्वलंत प्रश्न भविष्य के गर्त में छिपा है।

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(साभार) संकलित