गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

न करना हमसे कोई बहाना, अभी तो आहट चटक रही है।
तभी बनाया हमें जो अपना, वह साँस अब तक धड़क रही है।।

दिया तुम्हीं ने जो दर्द हमको, इस रूह को ही तड़प मिली है।
ज़ख़्म अभी तक यूँ ही हरे हैं, कसक भी देखो तड़क रही है।।

लगी मुहब्बत भी दिल जली थी, किसी को अपना बना लिया था।
वही तुम्हारी ज़ुबां पे चर्चे, वही तो दिल में चहक रही है।।

उसी के पीछे मरे हुये थे, न साथ मेरा निभाया तुमने।
हमें चिढ़ाते जो मारा हमको, लगी बीमारी खटक रही है।।

जो बात ही बात में उसी को, सदा सराहा उस ग़ैर को ही।
उसी ने ली जान ख़ून पीकर, दुखाती दिल वह अब तलक रही है।।

क्या एक हमसफर था न काफी, चले जो दूरी भी साथ लेकर।
क्यों थीं हुईं दूरियाँ अभी गले में, ये बात ही तो अटक रही है।।

कटारें दो एक म्यान में, कभी धँसेंगी न मालूम था।
करूँ मैं कैसे सहन उसी को,अभी मुहब्बत दहक रही है।।

न ज़ुल्म ढा तू अभी तो ऐसे, हमीं फिर हद से बढ़ेंगे आगे।
वह सौत होगी या मौत होगी, यह बुध्दि अब तो सटक रही है।।

हटा नहीं जो क़दम ही पीछे, सुनो न तूफ़ान आएगा ही।
रास न आये उसे ही जीना, दिखा ज़हर वह गटक रही है।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’