पता नहीं क्यों?
जब तक निःस्वार्थ भाव से
कोई जुड़ा रहता है समाज सेवा में,
तब तक उनका ध्यान
रत्ती भर नहीं जाता मलाई व मेवा में,
तब मन में चलता रहता है कि
मेरा समाज कहीं दुखी तो नहीं है,
नजर आ जाता है कमी यही कही है,
लोगों को हर उस नियम को बताता है,
जिसे अपना कुछ मुस्कान लाया जाता है,
संविधान की एक एक अनुच्छेद
रह रह याद आने लगता है,
भ्रष्ट लोगों को चमकाते नहीं थकता है,
वो भूल जाता है अपना दुख,
लोगों से की हंसी में खोजता है अपना सुख,
मगर जैसे ही वो सामाजिक कार्यकर्ता से
एक कदम आगे बढ़ नेता बन जाता है,
बदलाव नजर आने लगता है सीना तन जाता है,
उनके पिछले कार्य उन्हें दिलाता है कुर्सी,
यहीं से शुरू हो जाता है मनमर्जी,
अब वो बहाने बनाना जान जाता है,
झूठ बोलने की बहुत बड़ी दुकान लगाता है,
अब उन्हें लोग प्यारे नहीं लगते
प्यारा लगने लगता है चमचा,
जो सिखाता है काम क्यों करें खामखा,
उनके काम करने के तरीके बदल जाते हैं,
शिलान्यास,उदघाटन,फीता काटना ही
विकास के प्रतीक बन जाते हैं,
अब वो काम नहीं करना चाहता छोटा,
अब तो वो हो चुका है
तन-मन-धन से मोटा,मोटा,मोटा।
— राजेन्द्र लाहिरी
