कविता

अक्टूबर की यादें

पता नहीं, अक्टूबर माह किसकी याद दिलाता है!!
आते हुए दीपावली की, झरते हुए शिवली की, और नज़दीक आती छठ पूजा की।
छठ तो मानो हमारे हृदय, रक्त, और हर धड़कन में व्याप्त है।
दशहरा के साथ ही मन में छठ की प्रतीक्षा शुरू हो जाती थी।
कानों में कहीं दूर से “बहंगी लचकत जाए…” की धुन गूंजने लगती है।
गेहूं चुनना, धोना, सुखाना, पिसवाना,
लौकी की सब्जी, चने की दाल, बचका क्या-क्या गिनवाऊं!
खरना की शुद्धता, डूबते सूरज का अर्घ्य,
उगते सूरज की लालिमा और फिर पारण का संतोष…
फिर पूरे वर्ष छठ के इंतज़ार की शुरुआत।
छठ के बाद जैसे वातावरण में एक शांत सूनापन उतर आता है,
और फिर धीरे-धीरे वर्ष भी विदाई की ओर।
2025 अब अपने अंतिम पायदान पर खड़ा है…
देखें 2026 क्या लेकर आता है।
ईश्वर करे आने वाला वर्ष सबके लिए मंगलमय हो,
हर व्यक्ति हर पर्व पूरे हर्ष से मना सके।
दीपों-सी उजली हों आपकी भावनाएँ, और सवेरे सूरज-सी नई उम्मीदें लाएँ।
इसी शुभकामनाओ के साथ।
जोड़े जोड़े फलवा सूरज देव घटवा पे तिवई….
जय हो छठी माई

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com