गोवर्धन पूजा – प्रकृति, पर्वत और भक्ति का उत्सव
गोवर्धन पूजा भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है जो मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध की अभिव्यक्ति है। दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को यह उत्सव अन्नकूट पर्व के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार द्वापर युग में जब इंद्र देव के अहंकार से ब्रजभूमि में भीषण वर्षा होने लगी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल स्वरूप में अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को सात दिनों तक उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। उसके पश्चात ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत और गौ माता की पूजा आरम्भ की, इसी घटनाक्रम की स्मृति में यह पर्व प्रतिवर्ष बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक भी है क्योंकि इसमें भूमि, अन्न, जल, गौ और वृक्षों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है जो हमारे जीवन के मूल स्तंभ हैं। इस दिन लोग प्रातःकाल स्नान करके घर-आँगन की सफाई करते हैं, फिर गाय के गोबर या मिट्टी से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसे दीपों, पुष्पों और रंगों से सजाते हैं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा की जाती है तथा अन्नकूट के रूप में छप्पन भोग अर्पण किए जाते हैं जिनमें पूड़ी, खीर, मिठाइयाँ, दालें और अनेक व्यंजन सम्मिलित होते हैं। पूजा उपरांत इस प्रसाद को परिवार, ब्राह्मणों और निर्धनों में बांटा जाता है जिससे समाज में सौहार्द और समता का भाव प्रकट होता है। धार्मिक ग्रंथों में इस पर्व का उल्लेख इस रूप में मिलता है कि यह उत्सव अन्न के प्रति आभार का प्रतीक है क्योंकि अन्न ही जीवन का आधार है। कृषि प्रधान देश भारत में यह पर्व किसानों, पशुपालकों और आम जनमानस के लिए विशेष महत्व रखता है। गोवर्धन पूजा का एक अन्य नाम अन्नकूट भी है, जिसका अर्थ होता है भोजन का पर्वत, अर्थात् उस अन्न का पर्व जिसके माध्यम से भगवान को प्रसन्न किया जाता है। इस दिन गौ पूजा का भी अत्यंत महत्व है। शास्त्रों में उल्लेख है कि गाय देवी लक्ष्मी का स्वरूप मानी जाती हैं और इनके स्पर्श से पापों का नाश होता है। गोधन के बिना जीवन अधूरा है, इसलिए इस पर्व को गोधन पूजन भी कहा जाता है। पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह पर्व अत्यंत उपयोगी है क्योंकि यह हमें प्रकृति संरक्षण और पशुधन संवर्धन का संदेश देता है। हिन्दू परंपरा में गाय का गोबर पवित्र माना गया है और इसी से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाया जाता है। इससे धार्मिक आस्था के साथ स्वच्छता और पर्यावरण संतुलन की भावना भी जुड़ी है। यही कारण है कि गोवर्धन पूजा केवल पूजा-पाठ का कार्य नहीं बल्कि धरती, जल, पौधों, पशुओं और मनुष्य के बीच पारस्परिक सम्मान और संतुलन का उत्सव है। यह पर्व यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति केवल देवता की आराधना में नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार में निहित है। जब मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य रखेगा तभी समृद्धि, सुख और शांति संभव है। भारतीय संस्कृति में गोवर्धन पूजा इस विश्वास का जीवंत प्रतीक है कि जहाँ अन्न, गाय, भूमि और प्रकृति की आराधना होती है, वहीं भक्ति, दयालुता और सच्ची समृद्धि का विकास हो सकता है,
— डॉ मुश्ताक अहमद शाह
