फिक्र से पहचान
ज़िक्र करने वाले तो हज़ार मिल जाएँ,
मगर फिक्र करने वाले कहाँ नज़र आएँ।
जो हाल पूछे बिना समझ ले दिल की बात,
वो ही अपना है, बाकी सब परछाईं जाएँ।
बोलों से नहीं, एहसास से जो जुड़ते हैं,
मौन में भी जो साथ खड़े दिखते हैं।
वक़्त की आँधी में भी जो ना डगमगाएँ,
वो रिश्ते ही सच्चे, बाकी सब मिट जाएँ।
ज़िक्र तो दुनिया रोज़ करती रहेगी,
फिक्र वही करेगा जो सच में स्नेही।
अपनों की पहचान यही तो निशानी है,
फिक्र में बसी हर सच्ची कहानी है।
जो तेरी हँसी में अपनी खुशी पाए,
तेरे ग़म को जो अपना दुख बनाए।
जिसे तेरा दर्द चुभे सौरभ बिन कहे,
सच में वही सच्चा अपना कहलाए।
ज़िक्र से नहीं, फिक्र से नाते गहरे होते हैं,
इनसे ही बस रिश्ते सुनहरे होते हैं।
ज़माना तो नाम से पहचान बनाता है,
फिक्र करने वाला ही अपना कहलाता है।
ज़िक्र से नहीं, फिक्र से पहचान होती है,
बातों से नहीं, एहसासों में जान होती है।
जो दूर रहकर भी पास लगे सदा,
वही तो रिश्तों की सच्ची उड़ान होती है।
शब्दों के मेले में मौन जो समझे,
वो ही अपना है, बाकी सब भ्रम है।
जिसे तेरे आँसुओं की आहट सुनाई दे,
वो ही तो तेरे दिल का मरहम है।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
