लघुकथा

सही मार्गदर्शन 

“जब देखो आप उसकी ही बढ़ाई करती हो। आपका लाड़ला है, वह बेटा है न।” स्वाति के मन की पीडा अविरल बह रही थी। माँ होती तो…

नई माँ को कितनी बार समझाया था उसने। लेकिन वे हमेशा उसकी गलतियों पर पर्दा डालती रही। उसे शह देती रही। गलत काम के लिए भी कभी रोका नही, टोंका नहीं। 

“मौज मस्ती के लिए छुपकर पैसे देना, जो चाहिए दिलाना आप ही करती हो न?”

रोहिणी अपनी नवपरिणीता बेटी स्वाति की झिडक सुनने को मजबूर थी। पापा की अकाल मृत्यु के बाद स्वाति बिटिया ने बडी शिद्दत से घर की आर्थिक जिम्मेदारी निभाई थी। अपने छोटे भाई को वह अपनी तरह कामकाजी, जिम्मेदार बनाना चाहती थी। लेकिन मां उसे छोटा बच्चा ही समझती रही। न उसे ज्यादा काम करने देती, न पढाई करवाती। दादी और मां के लाड ने उसे निकम्मा बना दिया था।

गलत संगत भी खुली छूट का ही नतीजा था। और आज तो हद हो गयी। पडोस की गुडिया से छेड़छाड़ करने लगा। बीच बचाव कर उसने बचा लिया वरना उसकी खाल उधाड़ देते लोग।

अब तो स्वाति की शादी भी हो गयी है। वह जानती है, दिल का अच्छा है छोटा भाई रीतेश, लेकिन कैसे सुधारे उसे?

स्वाति के पति बड़े ओहदे पर थे। सिफारिश से काम तो दिलवा दिया, लेकिन  सबसे काम करवा लेने की हिदायत भी दी। न किसी से काम करते समय बतियाना या फोन पर बेवजह बातें करने की छूट भी नहीं थी उसे। 

काम सीखते-सीखते वह अब अपनी जिम्मेदारियाँ समझ गया था। बुरी संगत भी छूटती गयी। स्वभाव में भी बदलाव हो रहा था। प्रेम से बोलना, बडों का आदर करना सीख.गया था।

दीदी के शादी के बाद ही समझ में आया उसे अपनी दीदी का बड़प्पन। ससुराल में रहकर भी अपनी मां और भाई का पूरा ध्यान रखती थी।

जिजाजी और दीदी हमेशा उसके साथ खडे रहते थे। चाहे गम हो या कठिनाई। वह आश्वस्त रहता था।

बचपन की प्रिय सखी सोनम उसकी जीवन साथी बनने जा रही है। अपनी दीदी को धन्यवाद देते भावावेश में आंखे नम हो रही थी उसकी।

माँ को अब पता चल गया था, बिटिया को गले लगाते कहा,

“सही मायने में स्वाति हो हमारे घर की। अपने तेज से रोशन कर दिया है घर तुमने।”

सही मार्गदर्शन से अपने छोटे भाई की जिंदगी सुधार दी थी उसने। बहन बहनोई हो तो ऐसे।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८