कविता

नई सदी का सूरज

मैं जागता रहा
देखता रह खुली आंखों से सपने
बोता रहा आकाश में
अपना उज्ज्वल भविष्य…

तिनका – तिनका जोड़ता रहा
हौसलों के पंख लगाकर
उड़ान भरता रहा
मैं जागता रहा ।

सागर तल में उतरा
मोतियों की तलाश में
समय की शिला पर लिखा
मैं बदल न सका
अब लगाता हूं हिसाब
कितना सार्थक हुआ मेरा श्रम ।

मैं जागता रहा
देखता रहा खुली आंखों से सपने
मेरे गवाह हैं
वो टूटे-फूटे दुर्गम रास्ते
जिन पर मैं निरंतर चला
और दुनिया की हंसी सहता रहा
जमाने भर का गरल पीता रहा
मैं अपने भीतर
नई सदी का सूरज उगाता रहा।

— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111