सामाजिक

मनुष्य के अस्तित्व में पहचान का संकट

आज का मनुष्य विकास की दौड़ में जिस दिशा में बढ़ रहा है, वहाँ भौतिक सुख-सुविधाएँ तो भरपूर हैं, पर आत्मिक शांति और अपनी पहचान की समझ गुम होती जा रही है। “पहचान” अब केवल एक दस्तावेज़, आधार कार्ड या सोशल मीडिया प्रोफाइल तक सीमित हो गई है, परंतु असल सवाल यह है कि क्या यही हमारी सच्ची पहचान है? मनुष्य आज स्वयं से यह पूछने पर विवश है—कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं, और इस विस्तृत संसार में मेरा स्थान कहाँ है? जीवन की इस जटिलता में वह राहें तो हज़ार देखता है, पर मंज़िल कहीं दिखाई नहीं देती।

वर्तमान समाज में व्यक्ति अनेक भूमिकाओं में बँट गया है—कभी वह पेशेवर है, कभी अनुयायी, कभी आलोचक, तो कभी उपभोक्ता। इन बाहरी भूमिकाओं के बीच उसका वास्तविक “स्वयं” कहीं खो गया है। जिस दिशा में हवा का रुख होता है, उसी ओर झुक जाना आज सामान्य व्यवहार बन गया है। लोग अपने असली चेहरे पर नकली किरदार ओढ़े हुए हैं, ताकि समाज में स्वीकृति मिल सके। लेकिन यह दिखावा धीरे-धीरे एक ऐसी आदत बन गया है, जिसने इंसान की सच्चाई को परतों के नीचे दबा दिया है। हर व्यक्ति अपने भीतर के भय, असंतोष और अकेलेपन को छिपाने के लिए एक बनावटी मुस्कान का मुखौटा पहन लेता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और गहरा कर दिया है। हम अपने “ऑनलाइन चेहरे” पर खुश और सफल दिखते हैं, जबकि भीतर कहीं खालीपन और उलझन बढ़ती जा रही है। वास्तविक समस्या यह नहीं कि पहचान खो गई है, बल्कि यह है कि हमने खुद को खोजने की प्रक्रिया ही छोड़ दी है। आत्मबोध, आत्मचिंतन और आत्मसंवाद जैसी बातें अब पुराने युग की अवधारणाएँ लगने लगी हैं। हम तकनीकी रूप से जितने “कनेक्टेड” हुए हैं, भावनात्मक रूप से उतने ही “डिसकनेक्टेड” हो गए हैं। इंसान अब संवाद नहीं करता, बस संपर्क बनाए रखता है। रिश्ते अब सिग्नल और डेटा पर टिके हैं, आत्मीयता और संवेदना पर नहीं।आज आवश्यकता है आत्मबोध की—अपने भीतर झाँकने और अपनी असली पहचान को पहचानने की। जब इंसान अपनी सच्चाई, अपने मूल्यों और अपनी करुणा को स्वीकारता है, तभी वह समाज में सार्थक भूमिका निभा सकता है। पहचान बाहर नहीं, भीतर से बनती है। हमें बच्चों को और युवाओं को यह सिखाना होगा कि पहचान किसी लाइक, फॉलोअर या पद से नहीं, बल्कि अपने चरित्र, सच्चाई और संवेदनशीलता से बनती है।यदि हम अपने भीतर झाँकने का साहस जुटा लें, तो पाएँगे कि पहचान कहीं खोई नहीं है—वह तो हमारे भीतर ही जीवित है, बस हमें उसे फिर से जगाने की आवश्यकता है।

— मुनीष भाटिया

मुनीष भाटिया

जन्म स्थान : यमुनानगर (हरियाणा) उपलब्धियां: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख एवं कविताएँ I प्रकाशन: चार कविता संग्रह एवं तीन निबंध संग्रह, तीन quote बुक्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की दस हजार से अधिक पत्र पत्रिकाओं में वर्ष 1989 से निरंतर प्रकाशन I 5376, एरोसिटी, ऍफ़ ब्लाक, मोहाली -पंजाब M-7027120349 munishbhatia122@gmail.com