हां अपनों के लिए
न उसे आन बान की जरूरत है,
न उसे शान की जरूरत है,
न उसे पहचान की जरूरत है,
और न तो उसे नाम की जरूरत है,
वो सब कुछ सह कर लगा रहता है,
अपने परिवार के लिए
दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में,
मेहनत पसीने और थकान की आड़ में,
थक कर चूर हो जाने के बाद भी
उफ करना नहीं चाहता,
सबकी जरूरतें पूरी कर के भी
अपने लिए कुछ धरना नहीं चाहता,
पांच-सात सालों का लिया हुआ कपड़ा
आज भी शौक से पहनता है,
कपड़ों के फटे हुए हिस्से
औरों को घर वालों को नजर आ जाते हैं
मगर वो खुद नजरअंदाज करता है,
अभी तो बहुत साल चलेंगे
सदा इस मुगालते में रहता है,
हर वक्त एक ही धुन कि
हालात कुछ तो सुधरे घर का,
वो सही मोल भी नहीं लगा पाता
अपने अंदर के हुनर का,
ख्वाहिशें छोड़ आया है बचपन के पास,
मेरे अपनों को मिले समय पर भोजन
मन में लिए बस एक ही आस,
बच्चों का क्रोध,उनकी शिकायत पर
नहीं करता रंच मात्र भी गुस्सा,
इन सारी परिस्थितियों को
बगैर दुख के मानता है जीवन का हिस्सा,
सभी रिश्तों ने भरपूर इस्तेमाल किया,
अपनत्व से दूर करने का सिला दिया,
पर वो कैसा आदमी है
अपना काम किये जा रहा है,
हां वो एक बाप है जो
अपनों के लिए जिये जा रहा है।
— राजेन्द्र लाहिरी
