कविता

पागल फकीरा मित्र यमराज

आज दोपहर जब मैं सो रहा था 
उसी समय यार यमराज आ गया 
उसे देख मेरे मन में, एक नई खुराफात ने जन्म ले लिया।
मजबूरी में या जो भी समझें
मैंने उसे हमेशा की तरह ससम्मान बैठाया 
चाय-पानी पिलाया और फिर फरमाया
सोचता हूँ, कि अब तेरे साथ 
अपनी मित्रता का पटाक्षेप कर लूँ
और जाकर हिमालय पर डेरा जमा लूँ।
इतना सुन यमराज आपे से बाहर हो गया 
और कहने लगा – और साथ में यह भी तो चाहता होगा 
कि तेरी बात मैं बड़े प्यार से सुन लूँ।
यमराज भी शायद अपने रंग में आ गया 
और बड़े प्यार से कहने लगा- कि सोच मत 
अपनी सोच पर तत्काल अमल कर और चुपचाप निकल।
पैदल चल जाएगा या घोड़ा गाड़ी का इंतजाम कर दूँ
अकेले जाने का विचार है
या दो चार सेवादार साथ कर दूँ,
भौजाई को खबर है या उन्हें भी मैं ही बताऊँ?
वैसे मेरा विचार है, कि कल जाना चाहता है 
तो आज और अभी निकल ले,
और मेरी नजरों से खुद को सदा के लिए दूर कर ले।
मेरी शुभकामनाएँ सदा तेरे साथ रहेंगी,
मेरे संग मित्रता के पटाक्षेप का 
पूरा हिसाब-किताब करेंगी।
माना कि तू मुझे वहाँ मुझे चाय नहीं पिला पाएगा
शायद इस बात का भी तुझे दुःख हो रहा होगा 
बस! इसीलिए मेरी मित्रता के बंधन को 
तू हमेशा के लिए तोड़ना चाहता होगा।
पर तू शायद भूल रहा है 
कि मेरा जन्म तेरे लोक में नहीं हुआ है 
जहाँ मित्रता की भर जाती है 
अपवादों को छोड़ दें,  
तो सिर्फ स्वार्थवश ही निभाई जाती है।
वैसे जरा ईमानदारी से तू मुझे इतना बता दे
क्या तू मुझे भूल कर वहाँ रह पाएगा?
और हँसी-खुशी बिना आँसू बहाए रह पाएगा?
मुझे नहीं पता, तू मुझसे पीछा क्यों छुड़ाना चाहता है,
या किसी अपराध की सजा देना चाहता है।
अरे मेरी छोड़, भौजाई का तो ख्याल कर लेता।
आखिर उन्होंने तेरा क्या बिगाड़ा है?
बस! कभी-कभार दस- बीस बेलन ही तो मारा है,
पर तेरा जीवन भी तो उन्होंने ही संवारा है।
तेरे यार को भी दुलारा-पुचकारा है।
फिर भी यदि तू ऐसा ही चाहता है 
तो वो सब कर ले,  जो तुझे प्यारा है,
भौजाई का ध्यान मैं रख ही लूँगा 
तुझ नामुराद के लिए उन्हें रोने तो नहीं दूँगा 
तुझसे मित्रता के सारे भाव गंगा जी में बहा दूँगा।
तेरी छाती पर मूँग दलने के लिए 
भौजाई को भी हिमालय पर लाकर छोड़ दूँगा,
अपने चाय-पानी का इंतजाम और कहीं कर लूँगा 
यमराज हूँ, अपना जुगाड़ तो बैठा ही लूँगा,
पर इतना याद रखना प्यारे,
कि तूने मेरी मित्रता देखी है 
तो अब दुश्मनी भी दिखा दूँगा।
अच्छा होगा – तू मेरे साथ 
मित्रता के पटाक्षेप की बात, सिर्फ सोचते भर रहना 
भूल कर भी उस पर अमल बिल्कुल मत करना,
वरना मित्रता की कसम बहुत पछताएगा 
जब मैं अपनी औकात पर आ जाऊँगा।
वैसे भी मुझे कुछ खास नहीं करना होगा 
बस! तेरे लिए यमलोक की राह में 
मात्र अवरोधक बनना होगा।
तब तू मेरा क्या किसी का भी कुछ नहीं कर पाएगा
बिना शरीर वाली आत्मा के साथ इधर-उधर भटकेगा,
मगर चैन की साँस तो बिल्कुल नहीं ले पायेगा,
तब तू अपनी भूल पर पछताएगा 
और सिर्फ मित्र यमराज को ही याद करेगा
मेरे संग अपनी मित्रता के गीत गाते हुए आँसू बहाएगा।
उसकी बात सुनकर मैं काँप गया 
आगे बढ़कर मित्र को गले लगा लिया,
और मित्रता के पटाक्षेप का विचार त्याग दिया,
यमराज की संभावित दुश्मनी से खुद को बचा लिया।
वैसे भी भले ही मेरा मित्र यमराज है,
मगर मेरे लिए तो वो सौ टका हीरा है,
एकदम पागल फकीरा है।

*सुधीर श्रीवास्तव

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