कविता

करोगे क्या यहाँ कला करके!

(मधुगीति 250812)

करोगे क्या यहाँ कला करके,
पताका क्या करोगे फहराके;
कपोत बनके क्यों न चल लेते,
हंस बनके न क्यों विचर लेते!

कितनी सम्पत्ति कमाना चहते,
कला को बेचना यहाँ चहते;
योग अध्यात्म को भी बेचे हो,
बेच कर वेद को क्या पाए हो!

सेवा आयुर्वेद से हो कहाँ किए,
ज्ञान विज्ञान से हो धन संचे;
चिकित्सा कहाँ भाव रहके किए,
लेना जब-जब चहे प्रचुर खोये!

देखने राजनीति तुम चाहे,
नीति बिसराये वेदना पाए;
भेद तुम भेद-दृष्टि ना पाए,
दूरियाँ बना राज करना चहे!

साधना करके भी न सध पाए,
होके सन्यासी न्यास पद चाहे;
‘मधु’ के प्रभु के कहाँ हो हो पाए,
कहाँ गो-पाल गौ चरा पाए!

— गोपाल बघेल ‘मधु’