ये पीढ़ियाँ
निवी अपना कॉलेज पूरा भी ना कर पाई थी घरवालों ने उसका विवाह कर दिया। दर्श अच्छे परिवार का होनहार बेटा था। दादी की खातिर उसे यह विवाह करना पड़ा वह अपने पोते की बहू जो देखना चाहती थी। अब आँगन में तीन पीढ़ियों की चहकन थी।
हर पीढ़ी की पसंद थी निवी। आज पहली रसोई में अलग अलग तरह का भोजन– कुछ तीखा,कुछ सदा, कुछ मीठा। साड़ी संभालते डायनिंग टेबल को सजाने में मगन थी निवी ।
तभी कविता निवी से कहती है बहू थकी तो नहीं, बेटी ससुराल और मायके का संतर बताती हूँ, समझ लोगी तो कभी कोई कठिनाई जीवन में नहीं होगी।
लड़की मायके में कन्या की तरह अर्थात वैष्णवी रूप में पूजनीय होती है और ससुराल में लक्ष्मी तथा अन्नपूर्णा के रूप में पूजनीय हैं । जानती हो प्यार दुलार मायके से कम नहीं बल्कि दोगुना हो जाता है। निवी बोल पड़ती है समझ गई माँ! मैं सदैव सामंजस्य बिठाकर चलूंगी।
निवी को दादी प्यार से थपथपाती हैं । और कहती हैं तू सलवार सूट भी पहन सकती हैं। बस मर्यादा का पालन सदा करती रहना। निवी गले लग जाती है। विचारों विश्वासों रुचियों में भिन्नता दर्शाती सास, दादी सास के बिना निवी अब स्वयं को असहज महसूस करने लगती है । रिश्ता खून का न सही अपनेपन और प्यार जो था। निवी कहती हैं पीढ़ियां अंतर नहीं संस्कृति संस्कारों की अंतरंगता हैं।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल’
