ग़ज़ल
खुला बाजार यह दुनिया सभी व्यापार करते हैं
यह तूफानी नदी जिसको संभल कर पार करते हैं
जमी है बर्फ रिश्तो में इसे पिघलाया भी जाए
हम अपनी भावनाओं से इसे अंगार करते हैं
पता सच लग गया हमको सभी कुछ छोड़ जाना है
मगर फिर भी जमा धन दौलत का भंडार करते हैं
जुड़ा है स्वार्थ का रिश्ता भरी है लालसा मन में
मगर बतलाते इस जग को कि हम उपकार करते हैं
मिला है जितना भी जीवन सरलता से जिया जाए
हम अपने रिश्तों में पैदा स्वयं मझधार करते हैं
हमें मिलना नहीं है कुछ जो आए आपके हम घर
अगर वह आ गए मिलने बड़ा उपकार करते हैं
जुबां है कितनी जहरीली मगर मीठी गजब की है
इसी के दम से वह कितना बड़ा व्यापार करते हैं
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
