स्मृतियों का सावन
जीवन के सत्ताइस सुहावने सावन एक साथ गुजारने के बाद हमारे श्रीमान् जी चलते बने। बस! सावन भी रूठ गया और हरियाली भी। आगे तो पतझड़ ही पतझड़ था लेकिन साहित्य के सानिध्य ने इसे भी सावन बना दिया। लेखनी हाथ में आने और हाथ में निरन्तर रहने में मेरे पति स्व. श्री मोहनलाल जी का भी बहुत सहयोग रहा और कुछ घनिष्ट मित्रों का भी। किसी हद तक अनुज केवल कृष्ण ढल का भी।
सुना है, पढ़ा भी है कि पुराने जमाने में लोग-बाग दादी-नानी से कहानी सुना करते थे। किन्तु मैंने कहानियाँ अपने पिता और नाना के मुख से सुनी थीं। ऐसा क्यों हुआ? (अब यह अलग कहानी है) मैंने उन दोनों के मुख से सुनी थी, जिन्नों की कहानियाँ, जिन्न जो प्रसन्न होने पर किसी को भी माला-माल कर देते हैं। परियों की कहानियाँ, जो दूसरों की सहायता के लिए ख़तरे मोल लिया करतीं थीं। राजकुमारों की कहानियाँ जो मुसीबत में पड़ी राजकुमारियों को प्यार करते और उन की मदद के लिए सिर-धड़ की बाज़ी लगा देते। पंचतंत्र की कहानियाँ, जिन्हें बहुत बाद में पहचान पाई। आज हम उन कहानियों को लोककथा कहकर भी पुकारते हैं। ऐसी ही थीं वे रोचक कहानियाँ।
तब सोचती थी कि कहानी के पात्र राजकुमार और राजकुमारियाँ, जिन्न और परियाँ ही क्यों होते हैं। शायद वे हम जैसे नहीं होते होंगे किन्तु यह सोच बचपन के साथ ही विदा हो गई। किशोरावस्था तक आते-आते माँ के पास सरिता और मनोरमा जैसी पत्रिकाएँ नज़र आने लगीं, किन्तु उन्हें हम लोगों से बहुत छुपाकर रक्खा जाता। पुरातन-पंथी परिवार की सोच थी कि लड़कियाँ कहानियाँ पढ़कर बिगड़ जाएँगी और होता यह था कि अवसर मिलते ही उन्हें कैसे भी हथिया कर पढ़ डालना हम बच्चों का साहसिक अभियान होता। पकड़े जाने पर बहुत पिटाई होती, यह बिल्कुल सच है।
कहानियाँ पढ़ने की चटक तो लग ही चुकी थी। रोक तो थी, परन्तु रामायण और महाभारत पर कोई रोक नहीं थी। उनकी कथा-वस्तु हमें प्रभावित करती और यह अध्ययन निरापद भी था क्योंकि पिटाई नहीं होती थी। साथ ही गीत और कहानी दोनों का आनन्द सुलभ रहता।
फिर पता नहीं कब कविता लिखने लगी और ताई की भोली, माता-पिता की सुदेश और पति की आशा ‘आशा शैली’ हो गई। काव्य की धारा गीत, ग़ज़ल, लघुकथा तक फैल गई तो छोटे भाई केवल कृष्ण ढल (सम्पादक-प्रकाशक लघुभारत सा.) ने अम्बाला छावनी का पता दिया और डॉ. महाराजकृष्ण जैन जी के मार्ग-दर्शन में मैंने कहानी लेखन का कोर्स पूरा किया। डॉ. जैन के सम्पर्क में आने से कहानी की यात्रा में नये पड़ाव आए। पहला कहानी संग्रह तैयार हुआ तो उसका नाम रक्खा नर्गिसी महक, (शायद नर्गिस मेरी कमजोरी ही थी) सबसे पहले वही संग्रह तैयार हुआ लेकिन 20 पुस्तकें प्रकाशित हो जाने के बाद भी वह संग्रह नहीं छप सका। अब वही संग्रह ‘द्वंद्व के शिखर’ नाम से प्रकाशित हो चुका है। फिर भी साहित्य की हरियाली तो साथ ही चल रही है।
एक कहानी सुनी थी, एक राजा के पास दो ज्योतिषी आए जो अपने ज्योतिष को सर्वश्रेष्ठ कह रहे थे। राजा ने कहा, ‘‘ठीक है तुम मेरा भविष्य बताओ। बताओ मेरी आयु कितनी है और मेरे परिवार का क्या भविष्य है?’’
एक ज्योतिषी ने हिसाब लगा कर कहा, ‘‘महाराज, बड़े दुःख की बात है कि आपके सारे सगे सम्बन्धी आपकी आँखों के सामने मर जाएँगे, एक-एक करके।’’
राजा क्रोध में भरकर चीख उठा, ‘‘ले जाओ इसे और फाँसी दे दो।’’
अब दूसरे की बारी थी, उसने भी अपना हिसाब लगाया और बोला ‘‘महाराज, आप शतायु होंगे और अपने परिवार में सबसे लम्बी आयु केवल आप ही ने पाई है। बधाई हो।’’
समझ में नहीं आता कि लम्बी आयु वरदान है या शाप। जब पतिदेव गए तब उनकी आयु मात्र 49 वर्ष थी और बेटी 20 वर्ष की आयु में चली गई। बेटों का होना न होना बराबर है, पर मेरे साहित्यिक रिश्ते इतने सुदृढ़ हैं कि हरियाली साथ ही है। सावन आँखों से रूठ गया है, बड़ी से बड़ी बात पर आँसू नहीं निकलते अंगार निकलते हैं। पर यह बिल्कुल सच है कि ईश्वर सब कुछ कभी नहीं छीनता। एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरा खोल देता है। इतने अधिक स्नेही मित्र दिये हैं उसने कि मुझे कोई अभाव ही नहीं रहा। धन्यवाद ब्रह्माण्ड।
— आशा शैली
