आंखों से देखने की ख्वाहिश
खामोश दरीचे,
रोशनी के संग उड़ते,
अधूरे सपने।
हवा ने छू ली,
पलकों की नींद गहरी,
चाँद मुस्कुराए।
झील की लहरें,
तस्वीरें बोल उठीं,
मन खो गया है।
बारिश की बूंद,
स्मृतियों की छतरी में,
भीगती रूहें।
सांझ का सन्नाटा,
दूर कहीं दीप झिलमिल,
अंधेरा बोले।
मन के आईने,
दिखलाएँ अधूरी राह,
ख्वाब पिघलते।
पलकों की सरहद,
चाहत के उस पार है,
सूरज ठहरा है।
आंखों की मिट्टी,
ढूँढे अनकहे चेहरे,
रात बताती।
छू लो उजियारा,
सुनो धूप की आवाज़,
मन फिर जागेगा।
एक ख्वाहिश सी,
आंखों से देखने की—
जीवन कविता।
— डॉ. अशोक
