युद्ध और शांति
युद्ध तो ताउम्र लड़ने ही पड़ते हैं,
और शांति का आशय हमारे लिए
पेट की क्षुधा का शांत होना है,
वरना तो हमारे हिस्से रोना धोना है,
दिन में एक बार भोजन मिल जाये
यहीं तो है हमारे लिए युद्ध रूपी जद्दोजहद,
हम सोफे पर पसरे भी नहीं हैं
ना ही चाट पा रहे सुबह शाम शहद,
हां कहते हैं कुछ लोग हमें
नकारा और देश का अतिरिक्त बोझ,
मेहनत और पसीना ही है हमारी क्षमता,
आप लोगों ने खोज लिए हैं अपने लिए
उपयुक्त प्रजातंत्र व समाजवाद पर
हमसे चिपकी हुई है अभी भी
सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक विषमता,
आपको प्राप्त है जन्मजात
हवा में महल तैयार करने की हुनर,
जमीन पर रात दिन एक कर
हम खड़ा करते हैं कई मंजिला मकान
लेकिन दुपट्टा खींच आसानी से कह देते हो
कि इनमें नहीं है शऊर संभाल पाये चुनर,
जब हम ख्वाबों की जहां में चले जाते हैं
तब बहुत सुहाते हैं आपका वचन,प्रवचन,
अपने वादों,बखान किये इरादों से
मुड़ जाते हो किसी और दिशा,
दिखता ही नहीं लाचारों की दशा,
तब हम खुद को समझा लेते हैं कि
भद्रपुरुषों ने किये हैं नाट्य प्रहसन,
फिर हमें दोगुने उत्साह से करने पड़ते हैं युद्ध,
छाती में चिपकाये हुए शांति की ललक,
हमारा युद्ध जारी है साहब हमें न परख।
— राजेन्द्र लाहिरी
