फूल और बच्चे (बाल दिवस विशेष)
बचपन में किसी त्यौहार के दौरान दादी एक कहानी सुनाया करती थीं।कहानी यह थी कि एक राजा ने आवाँ बनवाया था लेकिन उसमें ईंटे पकती नहीं थी।जब राजा ने अपने पुरोहितों से पूछा तो उन्होंने सलाह दी इसमें ऐसे बच्चे की बलि देनी चाहिए जिसे उसके माता पिता ने कभी मारा पीटा न हो और न ही डांटा हो।गांव में एक बच्चा ऐसा था चूंकि उसका जन्म बहुत ही मान मनौती से हुआ था इसलिए उसे बड़ा दुलार किया जाता था और उसकी हर छोटी बड़ी गलती माफ थी।संयोग से उस बच्चे की बड़ी बहन का पति राजा के दरबार में नौकर था जब उसे यह बात पता चली तो उसने तत्काल अपनी पत्नी को बताया।उसकी पत्नी अपने मायके पहुंची और उसने पहुंचते ही अपने भाई को पीटना शुरु कर दिया।घर में कोई कुछ समझ नहीं पाया।जब उसने भाई को खूब पीट लिया फिर अपने माता पिता को सारी बात बताई।
उस समय तो ये एक कहानी लगती है लेकिन आज इसका विश्लेषण करने लगती हूँ तो ये लगता है कि अगर माता पिता ने जीवन में आने वाले संघर्षों के लिए बच्चों को तैयार नहीं किया तो बच्चे के जीवन में उनकी भूमिका अधूरी ही रहेगी। वर्तमान में एक चलन यह भी बढ़ा है खासकर मध्यवर्ग में कि बच्चे को हर सुविधा आसानी से उपलब्ध हो,उसे कोई काम न करना पड़े।किसी भी बात के लिए संघर्ष न करना पड़े। कुछ अभिभावक तो स्कूल में शिक्षक की सख्ती का भी विरोध कर डालते हैं। यदि शिक्षक किसी प्रकार की बर्बरता करता है तब तो उसे दंडित करना स्वाभाविक है परन्तु बच्चे को अनुशासित न होने देना भी बच्चे के लिए उचित नहीं। दुलार – प्यार हर बच्चे के लिए अनिवार्य है, बच्चे फूल से कोमल होते हैं लेकिन फूल को धूप,गर्मी, जाड़ा और बरसात खुद ही सहना पड़ता है।पेड़ का कोई अन्य भाग आकर उसे तिरोहित नहीं कर लेता,इसी में फूल की गरिमा है कि कोमल होते हुए भी वो किसी पर आश्रित नहीं और उसकी स्वयं की स्वतंत्र पहचान है। गौरतलब है कि कई सारे पेड़ अपने फूलों की वजह से ही वाटिका में स्थान पाते हैं और उन्हीं के आधार पर पहचाने जाते हैं।यही सपना हर एक अभिभावक का होता है कि वो अपने बच्चों के नाम से पहचाना जाए।
माता पिता के लिए हर दिन बाल दिवस होता है क्योंकि उनका दिन शुरू होता है अपने बच्चे की आवश्यकता को पूरा करने से और खत्म तब होता है जब बच्चा प्यारी मीठी नींद में सो जाता है।यह क्रम एक मां के लिए तब तक चलता है जब तक बच्चा अपने सारे क्रिया कलाप स्वयं कर पाने में सक्षम न हो जाए। बाल दिवस मनाने के पीछे जो सोच है वो यह है कि हम बच्चों के मन को समझने का प्रयास करें,वो जहां सही हैं उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें और जहां वे गलत उन्हें समझाएं कि उन्हें थोड़े सुधार की जरूरत है।
अगर हम अपने बचपन के बारे में विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि हमारे माता पिता हमारी परवरिश एक बने बनाए ढांचे में करते रहे।90 के दशक में एक मध्यमवर्गीय परिवार में संतान को बड़ा करने की एक आचार संहिता हुआ करती थी।अगर लड़का है तो उसे क्या करना है,लड़की है तो उसे क्या करना है।आज बचपन उन दायरों से बाहर निकला है लेकिन जाने -अनजाने उन दायरों के साथ जीवन को अनुशासित करने वाली डोर भी कमजोर होती गई है। बच्चे का स्वतंत्र विकास आवश्यक है लेकिन हमें उन्हें सीमाएं भी बतानी होंगी।हम अवश्य ही उन्हें उनके अधिकार के बारे में जागरूक करें पर उन्हें उनके कर्तव्यों का भान भी करवाएं।मसलन अगर हम अपने बच्चे को यह ज्ञान देते हैं कि भारत का नागरिक होने के नाते उसे शिक्षा पाने का अधिकार है,उसे किसी भी तरह के शोषण से सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है तो उसे यह भी बताना उतना ही जरूरी है कि उसके कर्तव्य कि वो अपने देश/राज्य/शहर/गांव को साफ सुथरा रखे। सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करे।
बालमन असीम संभावनाओं से भरा हुआ है।उनके पास ढेर सारी ऊर्जा है और सबसे बड़ी बात कि वो ऊर्जा किसी भी प्रकार की नकारात्मकता,द्वेष आदि से रहित है।ये सारी ऊर्जा एक सकारात्मक दिशा में लगे
ये जिम्मेदारी हम सबकी है। डॉ.ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के शब्दों में,जो तीन लोग समाज को सही दिशा दे सकते हैं वो हैं – माता, पिता और शिक्षक।
बच्चों के विकास में जो बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है वो है उनके अंदर के विवेक को जागृत करना और उनके भीतर स्वावलंबन का भाव विकसित करना।यह भाव जागृत करने में सबसे अच्छी भूमिका निभाता है अच्छा साहित्य ।अच्छे साहित्य तक बच्चों की पहुंच हम तभी सुनिश्चित कर सकते हैं जब जम उनके अंदर पढ़ने की आदत विकसित कर पाएं।आज के मोबाइल युग में यह एक अत्यंत ही गहरी चुनौती है हर एक माता पिता के सामने। लेकिन इस चुनौती का सबसे ज्यादा आसानी से सामना किया जा सकता है बस हमें भी अपने हाथों में किताब पकड़नी होगी।हर एक घर में एक आचार संहिता लागू करनी होगी कि घर में आने के बाद कोई मोबाइल में आंखें नहीं गड़ाएगा। अगर कोई ऑफिस या बिजनेस से संबंधित कार्य है भी तो उसके लिए एक समय निश्चित किया जा सकता है। एक किताब बच्चे के हाथ में दें और एक स्वयं पकड़े,फिर देखिए आप बच्चे के साथ साथ अपने भीतर भी एक नया परिवर्तन पाएंगे। न केवल बच्चा ज्ञान की दुनिया से अपना गहरा संबंध जोड़ पाएगा बल्कि माता पिता भी अपने काम और जिम्मेदारियों की एकरसता से बाहर निकलकर अपना एक नया आयाम खोज पाएंगे।सिर्फ पढ़ना ही नहीं, पेंटिंग करना,गाना,नृत्य करना या खुली हवा में बाहर घूमना या इस तरह की कोई अन्य गतिविधि जो आपको और आपके बच्चे को पसंद हो।इससे न केवल आपका अपने बच्चे से जुड़ाव बढ़ेगा बल्कि बच्चा भी आपमें एक नई दुनिया खोज सकेगा । याद रखिए कि केवल जीवन की भौतिक आवश्यकताएं पूरी कर देना ही एक अभिभावक का दायित्व नहीं वरन् बच्चे का शारीरिक,मानसिक व आध्यात्मिक विकास भी माता पिता का दायित्व है।यह बात बिल्कुल शाश्वत सत्य है कि बच्चा कहने से ज्यादा माता- पिता और अन्य परिवारजनों के आचरण को देखकर ज्यादा सीखता है। मसलन – यदि आप बच्चे को पौधों को पानी देने को कहते हैं तो हो सकता है कि वो आपकी बात न सुने लेकिन अगर वो आपको देखता है कि आप पौधों को पानी दे रहे हैं तो वो स्वतः और सहर्ष ही आपकी मदद करने लगता है।तो जब भी बच्चे के भीतर किसी अच्छी आदत को विकसित करना हो तो पहले स्वयं उस आदत को अपनाएं। बच्चे को दबाव से नहीं वरन स्वतः उत्साहित होकर किसी कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित करें।
एक अच्छी परवरिश वो नहीं जहां बच्चा दबाव में रहकर आज्ञाकारी और सुसंस्कृत बने बल्कि अच्छी परवरिश वो है जहां बच्चे के भीतर निरंतर जिज्ञासा के अंकुर फूटते रहें और उनका समाधान अपने अभिभावकों और शिक्षकों द्वारा पाते हुए वह एक विवेकवान मनुष्य की भांति विकसित होने का अवसर प्राप्त कर सके। उसमें प्रश्न करने का साहस भी हो और उनका उत्तर पाने का धैर्य भी। क्योंकि साहस और धैर्य ही वो शस्त्र हैं जिनसे जीवन का युद्ध कुशलता से लड़ा जा सकता है।
