ग़ज़ल
है बहुत काबिल मगर सच्चा बहुत है
इसलिये उसकी मुझे चिंता बहुत है
रूह से मिलना तभी विश्वास करना
जिस्म के किरदार में धोखा बहुत है
हाशिये पर जा पड़े हैं अस्ल मुद्दे
खांमखां की बात का चर्चा बहुत है
है ग़ुलामी नौकरी परदेस में पर
लोग करते हैं, वहाँ पैसा बहुत है
भीड़ है हर आदमी के पास फिर भी
क्यूँ न जाने हर बशर तन्हा बहुत है
अब करो बस धर्म का व्यापार इसमें
साथ पैसे के मियाँ रुतबा बहुत है
सच कहेगा हर बड़ी कीमत चुकाकर
यार ये बंसल बशर पगला बहुत है
— सतीश बंसल
