ग़ज़ल
किसी से दिल को लगाने की ज़रूरत क्या थी
कि हस्ती अपनी मिटाने की ज़रूरत क्या थी
दिल की दुनिया में सैलाब आ गया मेरे दोस्त
इतने अश्क बहाने की ज़रूरत क्या थी
मैं नापसंद था तो और ही कह देते कुछ
आईना मुझको दिखाने की ज़रूरत क्या थी
दिल लगना शुरू हुआ ही था तेरे बग़ैर
अब तुझे लौट के आने की ज़रूरत क्या थी
तुम तो कहते थे मैं करके भूल जाता हूं
फिर एहसान गिनाने की ज़रूरत क्या थी
— भरत मल्होत्रा
