गीत/नवगीत

ड्यूटी लगती नहीं सगी

तुम भी भागो, मैं भी भागूं, भागो,भागम – भाग लगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।

पहले लूटो अपने दम पर, फिर कानूनन मांग रखो।
कर्मवीर के श्रम-प्रतिफल को, आरक्षित बन खूब चखो।।
खाते – खाते उनके पूर्वज, का जी भर अपमान करो।
अगर किसी ने चूं भी बोला, छुआछूत संधान करो।।
भारत माता भेदभाव लख, रहती है दिन – रात जगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।

कही़ जातिवाद का जलवा, क्षेत्रवाद ललकार रहा।
भाषावाद उठा अपने फन, हिंदी को दुत्कार रहा।।
बहु भाषा के बीच सेतु बन, हिंदी सबको जोड़ रही।
क्षेत्रवाद के पोषक कहते, ‘हिंदी सबको तोड़ रही।।’
राजनीति के नागपाश में, भारत मां संग हुई ठगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।

रोटी भात नमक से बढ़कर, भूखे जन की चाह बता?
सर पर छप्पर,वस्त्र देह पर, क्या है इसमें बता ख़ता??
पर सेवा है पुण्य सुनिश्चित, पर पीड़ा है पाप महा।
कर्मों का परिणाम मिलेगा, सब धर्मों ने यही कहा।।
प्रेम भक्ति कर्तव्य समझकर, प्रेम दिवानी सदा पगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।

— डॉ अवधेश कुमार अवध

*डॉ. अवधेश कुमार अवध

नाम- डॉ अवधेश कुमार ‘अवध’ पिता- स्व0 शिव कुमार सिंह जन्मतिथि- 15/01/1974 पता- ग्राम व पोस्ट : मैढ़ी जिला- चन्दौली (उ. प्र.) सम्पर्क नं. 919862744237 Awadhesh.gvil@gmail.com शिक्षा- स्नातकोत्तर: हिन्दी, अर्थशास्त्र बी. टेक. सिविल इंजीनियरिंग, बी. एड. डिप्लोमा: पत्रकारिता, इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग व्यवसाय- इंजीनियरिंग (मेघालय) प्रभारी- नारासणी साहित्य अकादमी, मेघालय सदस्य-पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी प्रकाशन विवरण- विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन नियमित काव्य स्तम्भ- मासिक पत्र ‘निष्ठा’ अभिरुचि- साहित्य पाठ व सृजन