ड्यूटी लगती नहीं सगी
तुम भी भागो, मैं भी भागूं, भागो,भागम – भाग लगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।
पहले लूटो अपने दम पर, फिर कानूनन मांग रखो।
कर्मवीर के श्रम-प्रतिफल को, आरक्षित बन खूब चखो।।
खाते – खाते उनके पूर्वज, का जी भर अपमान करो।
अगर किसी ने चूं भी बोला, छुआछूत संधान करो।।
भारत माता भेदभाव लख, रहती है दिन – रात जगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।
कही़ जातिवाद का जलवा, क्षेत्रवाद ललकार रहा।
भाषावाद उठा अपने फन, हिंदी को दुत्कार रहा।।
बहु भाषा के बीच सेतु बन, हिंदी सबको जोड़ रही।
क्षेत्रवाद के पोषक कहते, ‘हिंदी सबको तोड़ रही।।’
राजनीति के नागपाश में, भारत मां संग हुई ठगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।
रोटी भात नमक से बढ़कर, भूखे जन की चाह बता?
सर पर छप्पर,वस्त्र देह पर, क्या है इसमें बता ख़ता??
पर सेवा है पुण्य सुनिश्चित, पर पीड़ा है पाप महा।
कर्मों का परिणाम मिलेगा, सब धर्मों ने यही कहा।।
प्रेम भक्ति कर्तव्य समझकर, प्रेम दिवानी सदा पगी।
सबको ही अधिकार चाहिए, ड्यूटी लगती नहीं सगी।।
— डॉ अवधेश कुमार अवध
