द्विज का जगत! (मधुकथा 251114) 23:05
जब भी जगत में चलते-चलते आत्म ज्ञान होजाए तो हम द्विज (द्वितीय जन्मे) हो जाते हैं! तब जीवन को नाटक की तरह जी सकते हैं और अपने शरीर मन व आत्म को समझकर जगत में अनन्त कार्य कर सकते हैं।
तब नया जीवन आरम्भ होता है और हमें जो काम दूसरे जन्मों में करने थे उनको भी अभी करना आरम्भ कर देते हैं! जब हम परम पुरुष के साथ एक होजाते हैं तो सारी सृष्टि हमारी हो जाती है और यहाँ सब कुछ सहज हो जाता है!
तब हम न प्रयास करते हैं और न कुछ इच्छा; सब कुछ स्वयमेव होता चलता है। हम केवल तटस्थ रहकर दृष्टा बने रहते हैं! सृष्टि स्वयमेव तरंगें लाती है और हम उनका आनन्द लेते चलते हैं!
तब संस्कारों व वृत्तियों के अनुसार अनायास कोई स्नेह करने लग जाते हैं तो कोई दूर हट जाते हैं या फिर कोई हमसे अटक लेते हैं; पर हर स्थिति में द्विज या सद्विप्र परमात्मा की लीला खेला समझते हुए आनन्द में ही मग्न रह उनका प्रबंधन कर लेते हैं।
उस अवस्था में न कोई द्वैत रहता है और न कोई चिंता या भय क्यों कि तब पराया या पर वश कुछ होता ही नहीं! सब परम पुरुष के ही स्वरूप होते हैं तो वे जो करें सब प्यारे ही लगते हैं और सब प्यारा ही लगता है! कारण अंततोगत्वा सब हमारे व सृष्टि के कल्याण के लिए ही होता है!
द्विज की अपनी कोई इच्छा अनिच्छा नहीं रहती क्यों कि वह परम पुरुष का प्रबंधक या निदेशक मात्र रहता है! जो जीव जैसा व्यवहार करता है वह बिना परम पुरुष की अनुमति के कर ही नहीं सकता अतः द्विज उसे परम पुरुष की ही मंशा या अनुशंसा मान लेता है!
यम -नियम, योग, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि व राजाधिराज योग में पूर्ण प्रतिष्ठित होने के बाद चित्त, अहं व महत में मिल सगुण ब्रह्म के साथ एक हो जाता है तब वही गुरु स्वरूप ले प्रकृति का प्रबंधन निदेशन करते हैं! तब वे सगुण होते हुए भी निर्गुण हो जाते हैं और जब उनको आवश्यक या उचित लगता है तो सगुण स्वरूप ले आ जाते हैं!
उनको न कोई विस्मय होता है और न कोई सुख-दुःख क्यों कि वे जगत से अलग ऊर्द्ध्व आयाम में अनन्त सुख की आनन्द गंगा में विष्णु वत अवस्थित रहते हैं! इसका कारण यह है कि सृष्टि में जो कुछ होता है उनके संज्ञान व संयोजना में ही होता है! वे सृष्टि के प्रबंध निदेशक रहे प्रबंधकों, अधिकारियों व कर्मचारियों को उनके मन व आत्म में सतत निर्देशित, संबोधित, संचेतित व अनुशासित करते चलते हैं!
सामान्यतः वे सदैव व्यस्त या सदैव स्वतंत्र अवस्था में रहते हैं! न उनका कोई परिधान (Dress) होता है और न पता (Address), न कभी थकते हैं न रुकते हैं, न अस्वस्थ होते हैं और न कभी रुष्ट! सारी सृष्टि -सारी व्यवस्था में जब भी किसी प्रबंधक या जीव को उनकी आवश्यकता होती है तो उन्हें वहाँ पहुँचना होता है!
द्विज दोबारा जन्मते हैं तो फिर आयु तो शुरू ही तभी होती है; तो वे शिशु या नवयुवक जैसे हो जाते हैं! शरीर मन पुनः स्फूर्त हो जाता है, सृष्टि के संकल्प उनके हो जाते हैं तो कार्य बढ़ जाते हैं! तब वे क्षण मात्र में या झलक दिखाकर वह कर जाते हैं जिसमें पहले वर्षों लगते थे!
विश्व के सारे विभाग, विचार, व्यक्ति, व्यवस्थाएँ, विपन्नताएँ, वैभव, संभावनाएं, विभूतियाँ, आयोजन, अनुभूतियाँ, और अभियोजनाएँ तब उनके अपने हो जाते हैं और सबके विषय में सरसरी नज़र व जानकारी तब उन्हें हो जाती है और न होने पर कर लेते हैं!
इस प्रकार द्विज का आत्म-जगत जीव के अनुभूत जगत से पूर्णतः अलग होता है! वह एक अलग आयाम है और उसकी अनुभूति बिना उसमें प्रवेश किए नहीं हो पाती!
परम पुरुष यहाँ सबको द्विज बनाने के लिए ही लाए हैं! जैसे ही कोई जीव इसकी जिज्ञासा करता है वे जान जाते हैं और किसी न किसी रूप में वे उपस्थित हो जाते हैं!
आवश्यकता है परम पुरुष को हृदय से चाहने की, वे तो हमारे परम पिता हैं, परम गुरु हैं और वे तो यह चाहते ही हैं कि उनके परम-पुत्र परम-पुत्री उनकी ओर देखें, उन्हें तनिक प्यार करें और जो कुछ भी उन्हें आता है उनसे सीख लें!
उनकी सृष्टि में जो कुछ है उनकी संतति के लिए ही है पर जीव केवल उनकी संपत्ति चाहते हैं, उन्हें नहीं! यदि उन्हें चाह लें, द्विज या सद्विप्र हो जाएँ तो सम्पत्ति तो मिल ही जाएगी!
जो द्विज हो गया वह परम पुरुष को ही चाहेगा उनकी सम्पत्ति को नहीं! सम्पत्ति जितनी चाहेंगे उससे ज्यादा मिल जाएगी पर तब उसका कुछ प्रयोजन भी नहीं रहेगा क्यों कि तब सोचने मात्र से सब मिल जाएगा!
परम पुरुष के द्विज को तब सारी सृष्टि मिल जाती है, वह उसी की हो जाती है तो फिर वह किस से क्या चाहेगा क्यों चाहेगा! तब वह केवल परम शिव – परम पुरुष को चाहेगा और उनके साथ एक हो जाएगा!
— गोपाल बघेल ‘मधु’
