नम आंखों का हर अश्क कहता एक कहानी
नम आंखों का हर अश्क कहता एक कहानी
बुढ़ापा सबको आएगा नहीं रहेगी जवानी
क्यों आदमी फिर भी जकड़ा है मैं ने
पड़ेगी जिंदगी फिर ऐसे ही बितानी
आंखों की नमी को है वही समझ सकता
शरीर में जिसके है नरम दिल बसता
दुनियां से उसे क्या है लेना
जिसे हर काम में पैसा है दिखता
किसी की आंख से जब बहता है पानी
जिंदगी है ऐसे जैसे दरिया की रवानी
खुद नहीं चलोगे तो थम सी जाएगी
जैसे कि तालाब में ठहरा हुआ पानी
जिंदगी उसके लिए मीठी है कहानी
बेमतलब बहाता नहीं जो आंख से पानी
दूसरों के काम जो न आ सके कभी
किस काम की वह जिंदगी किस काम की जवानी
— रवींद्र कुमार शर्मा
