बस यूँ ही
क्यों हमें आप यूँ सताते हैं
हम तो हर ग़म में मुस्कुराते हैं।
आप ये तो बताइए हमको
भूल जाते हैं या भुलाते हैं।
कर तो लेते हैं वादे वो लेकिन
सारे वादे कहाँ निभाते हैं।
हमने उनको तो टूट कर चाहा
अपनी चाहत मगर छुपाते हैं।
वो जो बसते हैं मेरी आँखों में
दूसरा क्यों जहाँ बसाते हैं।
— सविता सिंह मीरा
