सामाजिक

शुभ मुहूर्त , कितना ज़रूरी?

मेरी प्रिय सखी आज अपनी बेटी की शादी का कार्ड लेकर आई। उसके चेहरे पर खुशी थी, पर वही खुशी थोड़ी थकान से भी ढकी हुई। चाय पर उसने बताया कि “तेज़ लगन” होने के कारण मैरिज हॉल से लेकर मेहंदी वाली तक सभी ने दोगुने-तिगुने दाम माँगे। सारे इंतज़ाम जैसे किसी उत्सव का आनंद नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त पकड़ने की एक तनावभरी दौड़ बन गए थे।

उसके जाने के बाद मन में एक सवाल बार-बार उठता रहा—आख़िर शुभ मुहूर्त की इतनी ज़रूरत क्यों? जब हर दिन ईश्वर का ही बनाया हुआ है, तो फिर कौन-सा दिन अधिक शुभ और कौन-सा कम? जन्म, मृत्यु, बीमारी, फूल का खिलना, ऋतु का बदलना—इनमें से कोई भी घटना कभी मुहूर्त देखकर नहीं होती। न डॉक्टर ऑपरेशन मुहूर्त देखकर करते हैं, न कोई ट्रेन या फ्लाइट ग्रह-नक्षत्र देखकर चलती है। प्रकृति का हर काम अपने समय पर होता है—तो फिर हमारा जीवन शुभ-अशुभ की इतनी कठोर सीमाओं में क्यों बंधा हुआ है?

अक्सर कहा जाता है कि मुहूर्त देखकर विवाह करने से विवाह सफल होता है। किंतु इसका कोई प्रामाणिक प्रमाण किसी के पास नहीं। जो शादियाँ सफल हुईं—उनमें मुहूर्त कारण नहीं था, और जो असफल हुईं—उनकी जिम्मेदारी कोई पंडित नहीं लेता। भाग्य, परिस्थितियाँ, स्वभाव, समझ—यही विवाह के वास्तविक आधार हैं।

धार्मिक उदाहरण भी यही बताते हैं। राम और सीता का विवाह अत्यंत शुभ मुहूर्त में हुआ, पर जीवन सरल नहीं रहा। राम का राज्याभिषेक भी सर्वोत्तम समय में तय था, पर परिणाम क्या हुआ—संपूर्ण संसार जानता है। भरत के प्रश्न पर गुरु वशिष्ठ ने स्पष्ट कहा था— “हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश, अपयश विधि हाँथ।” यानी जीवन की निर्णायक घटनाओं पर विधि का नियंत्रण है, न कि किसी शुभ घड़ी का।

शुभ मुहूर्त का असली इतिहास—और आज की वास्तविकता

भारत कभी कृषि प्रधान देश था। पूरा जीवन-चक्र खेतों के मौसम पर आधारित था—बुवाई, कटाई, वर्षा और विश्राम का स्पष्ट क्रम था। इसी आधार पर विवाह और मांगलिक कार्यों के “शुभ मुहूर्त” निर्धारित किए गए। जब खेतों में काम कम होता था, लोग खाली होते थे, तब विवाह का समय शुभ माना जाता था। अर्थात शुभ मुहूर्त वास्तव में एक सामाजिक सुविधा थी—कोई दिव्य आदेश नहीं।

लेकिन आज का भारत बदल चुका है। यहाँ एमएनसी की नौकरियाँ हैं, स्टार्टअप हैं, निजी क्षेत्र के लंबे कार्य-घंटे हैं, अलग-अलग शिफ्ट्स हैं। लोगों की प्राथमिकता, समय-सारिणी और जीवन-शैली कृषि से बिल्कुल अलग है। तो जहाँ हमारा जीविकोपार्जन ही बदल गया, वहाँ हमारे “उपयुक्त समय” का पैमाना भी बदलेगा ही। आज के युवाओं के लिए वह तारीख शुभ है—जब उन्हें अवकाश मिले, तनाव न हो, परिवार सहज हो, और व्यवस्था सरल हो।

तनाव बनाम शुभता: क्या सच में इसका अर्थ रह गया है? अक्सर होता यह है कि शुभ मुहूर्त के दबाव में परिवार क्लेश का सामना करता है— “जल्दी करो, मुहूर्त निकल रहा है!” इस तनाव से पूजा-पाठ का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। शुभ का अर्थ शांति है, भय नहीं। अगर शुभ मुहूर्त सुख से ज़्यादा तनाव दे रहा है, तो उसका उद्देश्य ही खो जाता है।

आख़िर किसलिए विवाह किया जाता है? ताकि दो लोग और उनके परिवार शांति, सहजता और आनंद के साथ जीवन की नई शुरुआत करें। अगर वही शुरुआत तनाव, भागदौड़ और भारी खर्च से भरी हो, तो वह शुभ कैसे हो सकती है? सुविधा, सहजता और सामंजस्य ही आज का “शुभ समय” है

मैं यह नहीं कहती कि जानबूझकर कोई अशुभ माना जाने वाला समय चुना जाए। पर एक ही तारीख़ को “सबसे शुभ” मान लेने की जड़ता से हमें निकलना होगा। आज के समय में शुभ वही है— जब परिवार तनाव-मुक्त हो, जब वर–वधु को छुट्टी आसानी से मिल सके, जब खर्च अनावश्यक रूप से न बढ़े, जब रिश्तेदार बिना संघर्ष के आ सकें और जब मन शांत हो क्योंकि विवाह परंपरा भी है, लेकिन जीवन उससे कहीं बड़ा है।

अंततः— परिस्थिति से मेल खाता हुआ समय ही शुभ होता है। शांति से लिया गया निर्णय ही श्रेष्ठ होता है।

— प्रज्ञा पांडेय मनु

*प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'

वापी़, गुजरात