खंजरों के खंजर
हां हम ही हैं उन छुपे खंजरों के खंजर,
जो आतुर हैं बनाने खिली बगिया को बंजर,
उनके कदम जब पड़े थे,
जातीय वैमनस्यता बड़े थे,
अपने लोगों को जगाया,
सतनाम वचन सुनाया,
गिरे हुओं को खुद उठाया,
सब मनुज को एक बनाया,
थी जिसके अंदर जरूरत से ज्यादा पीड़ा,
छोड़ न पा रहे खुद से ऊंचनीच का कीड़ा,
वे भी उज्जवलित हो नतमस्तक हुए थे,
सतनाम की वाणी सबके होठों ने छुए थे,
जिस ध्वज को गुरू जी ने लहराया,
जोड़ा जैतखाम के संग संग दिलों में फहराया,
गर्वित उनके वंशज हम आज क्या कर रहे हैं,
मनुवादियों के चरणों में अपना सर धर रहे हैं,
प्रबुद्ध दिखने की कोशिश कर रहे
समाज के भयंकर दोगलों
दिन में तारे देख रहे हैं और क्या क्या देखने होंगे,
तुम्हें ही कह रहा हूं खंजर,
पता नहीं क्या क्या दिखाओगे मंजर।
— राजेन्द्र लाहिरी
