कविता

उसूलों के लिए मर जाना

धन-दौलत क्या दे पाएगी,
जब अंतर्मन ही हार जाए।
उसूलों पर जो खड़ा रहे,
वो हर तूफ़ाँ पार जाए।

काँटों में चलकर भी जिसने,
सत्य का दीप जला रखा।
उसने दुनिया को दिखला दिया—
मरना बेहतर है, यदि
उसूलों को बचा रखा।

उसूलों के लिए मर जाना,
जीने से बढ़कर मान है।
झुककर चलने से अच्छा,
सीना तान खड़ा इंसान है।

सत्य की राह कठिन सही,
पर दिल में उजियारा देती है।
झूठ की राहें कितनी आसान,
पर रूह को अँधियारा देती है।

जो सिद्धांतों पर अडिग रहे,
वो समय का चेहरा बदल देते।
जो टूट गए लालच के आगे,
वे खुद को भी सँभाल न पाते।

जीवन की मर्जी हो जाए,
तो क्या जीवन कहलाता है?
उसूलों का साहस हो जिसमें,
वही इंसान कहलाता है।

मरकर भी अमर वही होते,
जो सच पर सिर झुकाते नहीं।
इज्ज़त से जीना सीख लिया,
तो मौतें भी डराती नहीं।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh