कविता

धन्यवाद आपका

धन्यवाद दे जरूर रहा हूं पर
पूरी तरह दिल से नहीं दे रहा हूं,
पुरखों के साथ मैं भी
तुम्हारे दिये हुए जिल्लत सहा हूं,
तुम्हारे और तुम्हारे पुरखों के दिये जख्म
तिल तिल हम लोग सहे हैं,
बेइज्जत हो ये अपमान की आग
हम लोगों पर लावा की तरह बहे हैं,,
जात धर्म समय का ख्याल
शायद आप रखते होंगे,
इस बेबुनियाद विचार का स्वाद
सिर्फ और सिर्फ आप लोग चखते होंगे,
एक धन्यवाद तो बनता है
हमें जाति के नाम जलील करने के आपके अंदाज़ पर,
न डर,न भय अपनी जिद जारी रखते हो बेफिकर,
एक धन्यवाद तो और बनता है
आपके उस हुनर के लिए
जहां मस्तिष्क पर काबिज़ बैठे हो अनवरत,
अपने लोगों की कमजोरी के कारण
हम तोड़ नहीं पा रहे थोपा गया मिथक,
मगर एक खुशी भी है कि आपके इस काम से
हमारे लोग कभी न कभी उबेंगे,
भ्रम के समुद्र में अब ज्यादा नहीं डूबेंगे,
तुम्हारे यहीं आचरण हमें करेंगे एक दिन संगठित,
भरोसा है अपने काले कर्मों से होओगे व्यथित,
इंतजार है उस दिन का जब राज होगा हमारा,
तुम्हें दिखा देंगे संवैधानिक राज का नजारा,
तब तक लगे रहो धन्यवाद ले अपने काम काज पर,
और टिके रहो अपने उसी अमानवीय अंदाज पर।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554