ग़ज़ल
थोड़ा समय निकाल कर मुझे संभालो यारों,
साँसों की डोर टूट रही, गले लगा लो यारों।
दर्द ए दिल अब सहा नहीं जा रहा मुझसे,
आकर पास मेरे, जनाजा सजा लो यारों।
उस सितमगर ने सीने से लगाया नहीं,
तुम जनाजे को कंधों पर उठा लो यारों।
सुनो, आँखों से आँसू गिरने मत देना तुम,
आखिरी महफ़िल में उसे बुला लो यारों।
पलंग के सिरहाने रखें हैं चंद खत उसके,
अलमारी में रखे चंद तोहफें निकालो यारों।
“विकास” चला गया राह तकते उसकी,
आकर अब रेशमी कफ़न तो डालो यारों।
— डॉ. विकास शर्मा
