क्षणिकाएँ- टूटते हुए घरों का सच
1.
रिश्ते टूटे कहाँ हैं,
हम टूटे हैं
अहंकार के भार तले
प्रेम दबकर रह गया।
2.
घर तो दीवारें हैं,
टूटे हैं मन
जिन्होंने संवाद छोड़ दिया
और चुप्पियों को ओढ़ लिया।
3.
आजादी के नाम पर
अकेलापन चुना गया
पर किसी ने सोचा नहीं
कि यह आजादी आत्मा को काटती है।
4.
दो दिल साथ थे,
पर दिशा अलग
जहाँ ‘मैं’ बढ़ा
वहाँ ‘हम’ मर गया।
5.
रिश्ते बोझ नहीं थे,
हम धैर्यहीन थे,
विरोधों में प्रेम खोजने की
हिम्मत खो बैठे।
6.
मुस्कानें थीं,
पर एक-दूजे के लिए नहीं,
आज के रिश्ते
खुश चेहरों वाला अकेलापन हैं।
7.
विवाह टूटता नहीं,
भरोसा टूटता है—
और भरोसा वहीं मरता है
जहाँ संवाद खत्म हो जाता है।
8.
लोग कहते हैं-अकेले रहना
आसान है,
पर कौन बताए
सन्नाटे की दीवारें
कितनी ऊँची हो जाती हैं?
9.
प्रेम कभी मरता नहीं,
वह बस थक जाता है-
जब दो लोग
झुकने से इंकार कर देते हैं।
10.
करुणा बुजुर्गों के पास थी,
धैर्य पुरखों के पास-
हमारी पीढ़ी के हाथ
बस चकनाचूर रिश्ते आए।
11.
एक चुटकी में रिश्ता टूटता है-
क्योंकि हम
एक पल भी ठहरकर
सोच नहीं पाते।
12.
अकेलेपन को
जब आजादी कहा गया-
उसी दिन प्रेम ने
अपना घर छोड़ा था।
13.
घर तब टूटते हैं
जब दिल पत्थर हो जाएं-
और शब्दों की जगह
चुप्पियों का राज हो।
14.
रिश्तों का अंत
अचानक नहीं होता-
पहले रोशनी बुझती है,
फिर लोग।
15.
समय बदल रहा है,
लोग बदल रहे हैं-
पर प्रेम वही है,
जिसे समझने की फुर्सत अब किसी को नहीं।
— डॉ. निशा नंदिनी भारतीय
