कविता
प्रेम उसी तरह आता है
जिस तरह आती हैं रूहें।
रूप – राशि
रस -गंध
थोड़ी इच्छा
वासना थोड़ी -थोड़ी।
स्पर्श की चाहत
सौंदर्य में ही
छुपी रहती है प्यार बनकर।
रंग देती हैं
स्त्री -पुरुष की
संपूर्ण आकांक्षाओं के
सुनहरे मानचित्र को।
बचा नहीं रहता शेष,
कुछ भी विशेष।
प्रेम उसी तरह आता है
जिस तरह
आना होता है उसे।
प्रेम जब बन जाता है
दुःख तब
हो जाता है मनुष्य के
जीवन की पाठशाला।
शायद तभी
ज्यादा कुशलता से
पढ़े जा सकते हैं
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने,
बाकी दिनों की
तुलना में
दुःख के दिनों में।
— वाई. वेद प्रकाश
